गुरुवार, 16 नवंबर 2017

त्रासदी पर पुनर्विचार

त्रासदी पर पुनर्विचार.....

 ( मां  मित्रों और र्इश्वर के बहाने )


सिर्फ यही एक रास्ता है मेरे पास
कि बाहर के अंधेरे का सामना करने के लिए
अपने भीतर वापस लौट जाऊं !
कुछ वैसी ही कामना के साथ
जैसी कि मेरी मां की थी.....

मां ने बतलाया था-वह बहुत निराश थीं
जैसे अन्धकार के समुद्र में डूबती हुर्इ-सी
जब मैं उनके गर्भ में आया........
कि मैंने सुनहरे भविष्य की तरह तुम्हारी प्रतीक्षा की थी
जैसे अन्धकार के गर्भ से निकलता है सुबह का सूर्य
तुम्हारे अपना सूर्य बन जाने की कामना और सपने के साथ
पूरी की थी अन्तहीन अंधेरे की यात्रा
मैंंने तुम्हारे जन्म लेने की प्रतीक्षा में काटी थीं
न जाने कितनी रातें जाग-जागकरं.....

इसपुरुष-देह के साथ
मैं तो सिर्फ मसितष्कगर्भा ही बन सकता हूं
हां अपनी मांसपेशियों में भी कल्पना कर सकता हूं
नए सार्थक कमोर्ं को जन्म देने वाले सर्जक गर्भ की
ल्ेकिन मैं क्या करूं ! मैं जिसे किसी पर भी भरोसा नहीं है
किसी पर भी विश्वास नहीं है !
मैं जो अपने बाहर के सारे अन्धकार से जूझने के लिए
अपने भीतर की सृजनशीलता में डूबकर
दुनिया की सारी आशंकाओं और सारे भय को भूल जाना चाहता हूं
किसी श्रमिक की तरह बहते-बहाते अपने श्रम-जल के प्रवाह में
अनवरत बहते हुए अनन्त-काल तक जीना चाहता हूं मछलियों की तरह

मां के उस सपने को सच करते हुए
जिसमें वह मुझे चारों ओर से घिरे अन्तहीन समुद्र के बीच
तैरते देखकर पहले तो घबरा गर्इ थी
फिर यह जानकर आश्वस्त हुर्इ कि तैरना ही मेरी नियति है
कि मेरी नौकरी ही लगी है समुद्र के बीच तैरते पोत पर
रहने जीने और करते रहने के लिए.......

मां नें कहा था-जब यादों की ओर लौटना
घावों के इतिहास की ओर लौटना हो
अच्छा होगा कि पुराने इतिहास से बाहर रहकर
एक नए इतिहास को जन्म देने का प्रयास किया जाये
मां मुझे देखना चाहती थी नया इतिहास रचते हुए...


मां ने कहा था -अपने लिए सुखी होने के लिए
जन्म नहीं हुआ है तुम्हारा
ऐसे ही नहीं सूरज के उगने के साथ हुआ है तुम्हारा जन्म
तुम दुखी रहोगे.....जलते रहोगे अन्धे सूरज की तरह
दूसरों की अन्धकार से घबरार्इ आंखों के लिए
जिनके लिए जलोगे तुम
वे तुम्हें धन्यवाद भी नहीं कहेंगे
भूल जाएंगे अपनी आंखों के पीछे तुम्हारे जलने का सच
क्योंकि सभी को तुमसे सुखी रहने की आदत जो पड़ चुकी है
किसी को तुम्हारे सुख की ओर घ्यान भी नहीं जाता.....

मां ने कहा था तुम अपने हिस्से का भाग्य भी बांट देते हो
अपने मित्रों के बीच
कि मैं इतना भोला हूं कि जब भी मैं किसी से जुड़ता हूं
कुछ न कुछ खो बैठता हूं
वह मेरे मित्रों को किसी फूल पर मंडराते
आवारा पतंगो की तरह देखती थी
वह अच्छी तरह पहचान गयी थी कि
मै अपने मित्रों की जरूरत हूं
मित्र मेरी जरूरत नहीं हैं
वे सिर्फ मेरा समय बरबाद कर सकते है
वह भी अपने स्वार्थ के लिए
और एक दिन मुझे अकेला छोड़कर चल देंगे
अपनी जरूरतें पूरी हो चुकने के बाद......

कि तुम्हारे सारे मित्र फर्जी हैं
तुम्हारे सारे मित्र इसलिए फर्जी हैं क्योंकि उन्हें तुमने नहीं तलाशा है
बल्कि वे ही धीरे-धीरे खिंचते आए हैं तुम्हारे पास
अपने स्वार्थ के अनुरूप तुम्हारी उपयोगिता की पहचान करते हुए
कि लोग पहचान गए हैं मेरे भीतर का बुद्धूपन
और यदि मैं अपनी जरूरत के अनुसार
अच्छे मित्रों की तलाश नहीं कर सकता
तब भी मुझे अच्छे मनुष्यों की तलाश करनी ही चाहिए......
यधपि मैं इतना मेहनती हूं कि
शायद ही मुझे किसी सहारे की आवश्यकता पड़े !

मां कहती थी कि तुम्हारे कोर्इ भी काम नहीं आएगा
तुम ही काम आने के लिए अभिशप्त हो दूसरों के
तब तक पत्नी नहीं आयी थी
जो बता पाती कि आप ही ठगे जायेंगे हर बार......
तब तक मैं यह पहचान नहीं पाया था कि
मेरे स्वभाव की सारी कमजोरियों का राज
मेरे उन सांस्कृतिक विश्वासों में थी जो 
प्रतिद्वंद्वियों और चुनौतियों से मुक्त- एकल
भारतीय र्इश्वर की तरह ही भोली आश्वस्त और अद्वितीय थीं
मां को मेरे बाद र्इश्वर पर ही सबसे अधिक भरोसा था
लेकिन सबसे अधिक डरती थी वह र्इश्वर से ही
वह संदिग्ध है ....उसकी लीला अपरम्पार है
और उसे कोर्इ भी नहीं समझ सकता
उसकी खुशामद के लिए सिर्फ एक ही जन्म काफी नहीं !
जो पूरे विश्वास में जीते हैं र्इश्वर उनके साथ मजाक किया करता है
पता नहीं यह र्इश्वर वही है या कोर्इ और......
कहते हुए हंसती थी मां

हमें सावधान रहना चाहिए
कि जब हम विनम्र प्रतीक्षा में होते हैं
मानव जाति का एक बुरा चेहरा
हमारे भीतर के स्थगित भोले असावधान मनुष्य को पहचान जाता है
जंगल में अपने आसान शिकार की तलाश में घूमती हुर्इ
भूखे बाघ की शातिर शिकारी आंखों केी तरह.....
र्इश्वर जो करता है अच्छा ही करता है के परम्परागत विश्वास के साथ
एक आम भारतीय के भोले बुद्धूपन के साथ
तब मैं पूरे गर्व के साथ अपनी अच्छाइयों के अनुरूप ही
अपने साथ अच्छे व्यवहार और स्नेहिल प्रशंसाओं की प्रतीक्षा में था.....

एक र्इश्वर-जो बुराइयों के लिए समर्पित हो
हमारी भूलों गलतियों और अपमानों से बना हुआ र्इश्वर
हमारे हिंसक प्रतिरोध और प्रतिशोध में अभिव्यकित पाता हुआ
एक पागल र्इश्वर का शैतान की तरह होना
जो हमारे विश्वासों को प्रश्नांकित करता रहे
ताकि हम बचे रह सकें एक बुरे आत्मविश्वास से
उन बाहरी बुरे प्रभावों से-जब हम अपने साथ
अच्छे व्यवहार की उम्मीद में दूसरों द्वारा ठगी के शिकार होते हैं....

शायद एक आस्तिक भारतीय होने के कारण
तब मैं पूरी तरह अपरिचित था उस बुरे र्इश्वर यानि कि शैतान से

मुझे अच्छे मनुष्यों की अब भी तलाश है
अच्छे मनुय यानि कि जो बार-बार ठगे गए हों और
दुनिया के बुरे चेहरे को देखने के सर्वथा अयोग्य हों
मुझे उन शक्की लोगों की भी तलाश है
जो किसी के अप्रत्याशित बुरे व्यवहार से हतप्रभ होकर
अपने ही भीतर सिमट गए हों
मुझे अब भी तलाश है उस मनुष्य की
जो अपनी नैतिकताओं को ढोते रहने के प्रयास में
समय और समाज से बाहर हो गया हो
मैं उस अदृश्य मनुष्य की खोज में हूं
जो अपने निर्वासन और अकेलेपन में र्इश्वर से होड़ ले रहा हो
मैं उसे ही अपना मित्र बनाना चाहता हूं

इस दुनिया में आने के बाद उसने मुझे बताया था
और मुझे अच्छा लगता कि सच ही कोर्इ र्इश्वर होता
कोर्इ भी असितत्त्व के मनहूस अकेलेपन में कैद होना नहीं चाहेगा
यह दुनिया जो असितत्त्व की अन्तहीन आवृत्ति से बनी है
मुझे अच्छा लगेगा कि मैं न सही कोर्इ दूसरा ही हो
जिसके होते हुए मैं पूरी तरह गैरजरूरी प्रमाणित हो सकूं
मैं किसी भी अस्तित्व के सम्मान में
अपनी सारी महत्त्वाकांक्षाओं को स्थगित करते हुए
अनन्तकाल तक प्रार्थना में झुके रह सकता हूं
लेकिन मैं भ्रमों से भरा हुआ जीवन जीना नहीं चाहता
मैं चाहता हूं कि मेरे सारे भ्रम टूट जाएं
अब तक जिया हूं चाहे जैसा
लेकिन मैं नंगे सच के साथ ही मरना चाहता हूं......

सच कहूं मैं..... मुझे बताया गया था
जो कुछ भी हो मेरे हिस्से का जीवन
सब कुछ इतना नियत कि र्इश्वर की ओर से ही हो जैसे.......
एक अटूट मजबूत विश्वास की तरह
मैं सफलता के संयोगों की निरन्तरता को
किसी चमत्कार की तरह र्इश्वरीय समझने लगा था
मैं समझता था बचे रह जाएंगे -
मैं और मेरे जैसे लोग जैसे अब तक उल्का पिण्डों की अनवरत मार
सहते हुए भी बची रह गयी है धरती
धरती पर चुपचाप बचा रह गया है जीवन

मित्रों में घबराहट फैलने लगी थी
और मित्रगण चुपचाप खिसकने और बदलने लगे थे
एक दिन पिता नें हाथ खड़े कर दिए कि बूढ़ा हो गया हूं मंैं
कि अब सहारे के लिए कोर्इ दूसरा र्इश्वर ढूढ़ो.....
मैं किसी समझदार र्इश्वर की प्रतीक्षा में था
जबकि अस्तित्व की आवृत्ति के साथ 
र्इश्वर अनेक भ्रामक  विकल्पों में था
मेरा जीवन प्रेम के बाजार में खड़ा था-
किसी एक के चयन के लिए...

कि जिस दिन नौकरी लगी
उस दिन पता चला कि प्रेम के बिकाऊ बाजार में
अब तक बचा हुआ हूँ मैं अपनी बची हुर्इ कीमत के साथ....
मित्रगण झगड़ने लगे थे
अपनी-अपनी साली के साथ विवाह प्रस्ताव देने के लिए
कि जैसे वे हमेशा-हमेशा के लिए कैद कर लेना चाहते थे मुझे
किसी उपयोगी की तरह अपने रिश्तों की स्थायी कैद में

मां नें कहा था-बहुत -सी बेवकूफियां
हम साथ-साथ कर जाते हैं
अन्धी प्रतिक्रियाओं के उन्माद में
बिना समझे....बिना सोचे
और यह भी कि जब हम अपने साथ हुए हादसों के लिए
दूसरों की संदिग्ध भूमिका की तलाश कर रहे होते हैं
हम स्वयं ही एक पक्ष बन चुके होते हैं
अपने ही साथ हुए अपराधों के लिए.....



हम चाहते हैं.....



तुम्हारे दिए और जिए हुए सच
हमारे प्रश्नों से घायल हो चुके हैं
हम तुम्हारी गलितयों-मूर्खताओं को
वैसे ही जानते हैं
जैसे आने वाली पीढि़यां जानेंगी
हमारी मूर्खताओं को
हम तुम्हारी दी हुर्इ निष्ठाओं से छले गए हैं
हम घर से बेघर
समय से असमय हुए हैं.....

तुम्हारी दी हुर्इ दाढि़यां
नोच डालनें की हद तक
खुजली पैदा करती हैं
हमें लहूलुहान करती हुर्इ-
हम नहीं चाहते कि हमारा नाम
तुम्हारी बनार्इ हुर्इ जातियों के
एक र्इमानदार कुली के रूप में लिखा जाये....

ळम अपने वंशजों को
अपना भारवाहक बनाने वाली
तुम्हारी हिंसक परम्परा के खिलाफ हैं
हमें नहीं चाहिए
आदमी की खाल उघेड़कर
उसके लहू में डुबोकर लिखे गए
तुम्हारे सनातन दिव्य ग्रन्थ
हम तुम्हारी
सभी को मारकर जीनें वाली
अमरता के खिलाफ हैं.....

तुम्हारा हमारे समय पर लदकर
बलात जीवित रहना
एक अप्राकृतिक अपराध है
हम न्याय चाहते हैं
हम तुम्हारी मृत्यु चाहते हैं पितामह !
हम चाहते हैं कि
आने वाली पीढि़यों को भी
नयी सभ्यता के लिए
अपना नया पितामह चुनने का
अधिकार मिले
बताओं !
बताओ कि तुम्हारी मृत्यु कैसे होगी ?



 हत्याएं




कुछ तो गलत हुआ ही है
लेकिन इतना तो होता ही रहता है गलत
अच्छा करने और करवाने की जिद में
काफी कुछ ठीक नहीं हुआ है लेकिन हो सकता था
फिर भी सब तो सही नहीं हो सकता !
इतिहास को मुटठी में रखने के लिए
बहुत सारी शकितयों का रखना होता है ध्यान.....

कुछ हत्याएं हुर्इ हैं....हो रही हैं और हो सकती हैं
इतिहास को पूरे सूझ-बूझ के साथ
प्रायोजित करते हुए भी........

जब दु:ख उनके मरने या उन्हें मारने का नहीं
बलिक मारने के पूरे प्रयास के बाद भी
बचे रह जाने की खतरनाक संभावनाओं का भी होगा

कुछ हत्याएं तो हो ही जाती हैं
आसानी से सुलभ और सुरक्षित लक्ष्य की तलाश में
सम्पूर्ण निरर्थकता में घटित दुखान्त की तरह
कुछ हत्याएं घटित हो जाती हैं
निशानेबाजी के अभ्यास में भी
कुछ तो शौकिया.....यू ही-मैं भी कर सकता हूं कि नहीं !
कुछ हत्याएं करनी पड़ती हैं
हत्या करने की शकित को प्रमाणित करने के लिए

हत्याएं आंशिक होती हैं और पूर्ण
हत्याएं मानसिक होती हैं और वास्तविक
चोरों और डकैतों का फर्क रहता ही रहता है
उनकी अपनी जरूरत और हिम्मत के समानुपात में....
सारी नापसन्दगी के बावजूद
मेरी परेशानी की वजह यही है कि
सिद्धान्तत: तब-तब मैं डर जाता हूं
जब मुझे भी लगने लगता है कि दुनिया तो तभी बदल पायेगी
जब वे बीत जाएंगे अपने बीते जमाने के विचारों के साथ

जब मैं अश्लील उपसिथति की तरह
कुछ लोगों का होना देखता हूं और तरस खाता हूं

एक कभी भी गिरकर भीड़ को मार देने वाली
आशंकाओं वाली हत्यारी छाया देने वाले वृक्ष के रूप में उपसिथत
अप्रासंगिक समय के लिए तो मौत की सुर्इ दे देने के पक्ष में
संवैधानिक संशोधन कर ही देना चाहिए

जिस मुकदमें में सारे गवाह पक्षæोही हो गए हों
ऐसे संनिदग्ध हत्यारों के लिए भी होनी चाहिए कोर्इ विशेष जेल

वे सारे हत्यारे
जो हत्याओं के असफल प्रयास के बाद
एक बार फिर जीना चाहते हैं
एक गुमनाम मासूम सज्जन की तरह.....
या वे सर्वविदित किन्तु अनिर्णीत हत्यारे
जो सन्देह का लाभ पाने के लिए
अपने हाथों की जा रही हत्याओं के प्रचार से डरते हैं
या फिर वे जो हत्या करने के लिए आसान
शिकार के रूप में पाते हैं गुमशुदा चेहरों को.....
जहां कुछ हत्यारे प्रचारित चेहरों की तलाश में रहते हैं
हत्या के पश्चात गुमशुदगी से बाहर निकलने के
स्वर्णिम अवसर के रूप में......

हत्यारे जो करते रहते हैं हत्याएं
अपने जीवित बचे रहने के एकमात्र विकल्प के रूप में
उनके मारे जाने के बाद भी हत्यारों के बनने का
बना रह सकता है पेशेवर सिलसिला
क्या पता उकसाने वाली कहानियों के रूप में
या पागल क्रोधी जीन के रूप में
जो कभी भी किसी को बर्दाश्त नहीं कर पाता

एक दिन दो हत्याएं करने वाले के पास
चार हत्याएं करने वाला बेटी का रिश्ता लेकर पहुंचेगा
और दूसरी पीढ़ी में दस हत्याएं करने वाला पुत्र पैदा होगा
यह भी संभव है कि हत्यारे का पुत्र पैदा होते ही मार दिया जाय
और एक दिन खत्म हो जाय उसका वंश भी !

मैं जब भी कक्षा में कहता हूं
कि जो बहादुर थे वे इतिहास में लड़-लड़ाकर मर-मरा गए
सही-सही वही बचे जो कायर थे
इसलिए बचना है तो एक समझदार कायर बनो
क्योंकि जो डर सकता है वही बच सकता हैे
डरना हमें समझदार बनाता है और जीने का सही ढंग और रास्ता भी सुझाता है
क्योंकि सिर्फ सच्चा कायर ही बुद्धिमान हो सकता है
सिर्फ वही अपने मारे जाने के पहले भी अपना मरना देख सकता है
कहता हूं तो अविश्वास से हंसते हैं बच्चे
कर्इ तो हंसते -हंसते मर मर जाते हैं
बिना डरे बहादुर बनने के प्रयास में.......ं

इसके बावजूद हत्याओं और हत्याओं के बारे में
मेरा अनितम निष्कर्ष यह है कि
बचे रहना है तो छिप जाओ कायरों की तरह....कायरों के बीच
हत्यारों के मारे जाने और एक दिन सब कुछ कायरों के नाम छोड़कर
चले जाने वाले दिन की प्रतीक्षा करते हुए
समय के पिछवाडे भी जगह मिले तब भी.....
गुपचुप चलाते और बढ़ाते रहो अपना वंश
एक निष्कर्ष यह भी है कि एक दिन निरन्तर बढ़ती जनसंख्या के साथ
बढ़ती प्रतिस्पद्र्धा-सभी कायरों को बहादुर बना देगी
हत्यारे अनितम दौर की हत्याएं करने से ठीक पहले
मिल-बैठकर समझौता करेगे
बनाएंगे संविधान कि अब से सभी लोग कायरों की तरह जिएंं.....
संभव है तलाशा जाय धरती के सबसे विनम्र कायर का जीन
मानव जीवन को बचाए रखने के अनितम विकल्प के रूप में .....



यह समय




युद्ध का समय है यह
लड़नें से अच्छा है सुलह-संवाद
घायल होने से अच्छा है बचना
मरने से अच्छा है पैदा ही न होना......

इस तरह
समस्याओं से भरे
इस उत्तर -समय में
युद्ध जीतने का यह एक ही अस्त्र शेष है
निरोध !!

युद्ध में ब्रेक का समय है यह
उस तथाकथित स्वतंत्रता के खिलाफ
जो एक गैरजिम्मेदार पीढ़ी द्वारा
अराजकता में बदल दी गर्इ थी !
दुर्घटनाओं के नंगा नाच का समय है यह-
जनसंख्या के विस्फोट तक
शर्महीन !

हंसिए नहीं !
सभ्यता और विज्ञान की यात्रा में ही
पहुंचे हैं हम
इस सवाल तक-
यह ठीक है कि सभी विज्ञान पढ़ें
वैज्ञानिक बनें
लेकिन वे खाएंगे क्या ?
क्या करेंगे !
इतने वैज्ञानिक क्यों ?




रोना कोइ दृश्य नहीं


रोना कोइ दृश्य नहीं है
दृश्य का डूब जाना है
एक पहाड़ी झरने ंके पीछे...
जलते हुए जीवन का
अपनें सारे वस्त्र उतार कर
जीवन का कूद पड़ना है
अथाह खारे समुद्र में.......

यहां कहीं दूर तक
रोने की कोर्इ जगह
दिखार्इ नहीं देती....
इस शहर में
देर तक मुस्करानें के बाद
रोने के लिए
किधर जाते होंगे लोग !






जल जलहिं समाना....













धरती बांझ थी और आसमान निरर्थक
नि:संतान था पिता अपने पुत्र के बिना
प्रकृति विधवा थी और परम तत्त्व ओझल
तब अन्धकार की कोख में ज्योति की तरह वह उतरा......

तब चेतना डूबी थी विचारों की जड़ता में
और स्मृतियां जंगल में बदल गयीं थीं
पोथियों पर मूर्खताएं छपी थीं और ग्रन्थों में षडयन्त्र
कपटियों ने सारे प्रकाश को अपने पुत्रों-वंशजों के लिए
चुराकर बन्द कर लिया था

ज्ञान ऐश्वर्य के लिए था और र्ठश्वर व्यापारियों के लिए
परजीवियों का सत्य याचना के लिए-'मुल्ला का बांग' और 'पंडा का पाथर
मकड़ी जैसे अपने बुने जाल में पुकारती है कीट
धर्मग्रन्थों के शब्द कंटीली झाडि़यों में बदल गए थे- मारते हुए मनुष्य.....

जिन्हें कहा जा सकता है नीच-कहा जायेगा
बाझिन को बांझ.....कि द:ुखी का दु:ख सुखी के सुख का विषय है
निपूती का दु:ख.... गोद भरी मांओं की खुशी -हुआ ऐसा....

उतरा वह परम विवेक
जीवन-ज्यों सारे ब्रह्रााण्ड के गर्भ से अभी-अभी फूटा हुआ
निर्विकार अनाम पवित्र निस्सीम सागर-शिशु
आदिम मूल तत्त्व की तरह-अनन्त की ओर से
बंधीं और अनर्वर मानव-जाति के लिए.....

तालाब में जैसे खिलता है कमल
शिशु मिला वह नीरू को अपूर्व
खुले आसमान के नीचे प्रकट हुर्इ दिव्य ज्योति
पुरानी बसितयों के अंधेरे सीलन भरे दुर्गन्धाते तहखानों और बूढ़ी कोठरियों से दूर
खुली हवा में-जंगल-सी अनछुर्इ-अबोध पवित्र और अनायास.....

किसका जीवन है यह !....सोचा नीरू नें
किसका जीवन है यह !....पूछा नीरू नें बार-बार
उसकी सारी प्रतिध्वनियां उस तक ही लौट आयीं.....

यह मेरे लिए है-उसने आसमान की ओर
कृतज्ञता से भरे अपने दोनों हाथ उठाए और झुक गया धरती की ओर
उठाने के लिए एक अपूर्व दिव्य शिशु......


जो किसी का नहीं है ,सबका है-आसमान नें कहा
मेरी धरती पर जो भी जन्मा है-मेरा है....मेरी ओर से है
विरासत है....प्रतिनिधि है सम्पूर्ण असितत्त्व का-दुहराया ब्रहमाण्ड नें बार-बार......

जो किसी का नहीं है ,सबका है
सारे मायावी जोड़-तोड़ और अंकों की भीड़ के लिए
यह सिर्फ एक मानव-शिशु ही नहीं एक विराट शून्य है-सत्य-स्फुर्लिंग !
काल-जनित विकृतियों के....इतिहास के दुखती स्मृतियों के
उन्मादों-अपराधों.... पापों-दुर्घटनाओं के सारे प्रदूषणों का अन्त यह.......

यह किसी का नहीं है ,सभी का है-सबके लिए.....सब कुछ की ओर से
भटके समाज के हर गणित को शून्य करता हुआ
निरस्त करता हुआ सारे गलत-जीवन छलका ज्यों
मानव-जाति की रुद्ध दीवारों वाली सारी परम्पराएं तोड़ ---
                                                                                   More......






लड़की









1.



उसका समय उसके पास है
दर्पण में उग रहा है एक अजनबी चेहरा
और मन में एक अनिवार्य भय
कभी भी यह जीवन
किसी और को दे दिया जाएगा....







2.


अठारह वर्ष लग जाएंगे सीखते हुए लड़की
अठारह वर्ष तक लिखे जाएंगे
उसके वक्ष पर आवश्यक नारी अर्थ
अठारह वर्ष लग जाएंगे
उसको और
उसकी मनुष्यता को विभाजित करने में !

3.


लड़की प्रकृति में है और भाषा में भी
लड़की शब्दों में है और व्याकरण में भी
लड़कों से अलग लड़कों के पास
लड़कों के लिए......
लड़के प्रकृति में हैं और बातों में भी
लड़की से अलग.....लड़की के पास
लड़की के लिए.....
मनुष्य कहां है ?



4.


लड़की जानती है
कि उसके भीतर
कहीं भी नहीं है लड़की
फिर भी वह
जब कभी बाजार में निकलती है
लड़की हो जाती है

5.


कांटे उतने ही सत्य हैं
जितने कि नंगे पैर
लड़की के तलवों में उनका चुभ जाना....
लड़की न भी हो लड़की
उसे डर लगता है
गली के मोड़ पर
उसकी प्रतीक्षा में खड़े
घूरते हुए लड़कों द्वारा
कभी भी लड़की
बना दिए जाने से.....



















6.



वह जो चोर की तरह
बढ़ती हुर्इ लड़की को
घबराते देखता है
लड़की का पिता है....

वह जो चुपचाप
घिसता हुआ
लड़की के बढ़ने का अर्थ
बूझता है
लड़की का पिता है


7.


जब कभी भूल जाएगी लड़की
डरने की कोर्इ बात नहीं !
उन्हें याद है कि
उनके पड़ोस में
रहती है एक लड़की....

8.


कभी-कभी
सीढि़यां चढ़ती हुर्इ
उंची आकांक्षाओं वाली जूतियों पर
संभलकर चलती
सहसा लड़खड़ाकर
गिर पड़ती है लड़की
उसे अपनें गिरने का नहीं
गिरते हुए देख लिए जाने का दु:ख सताता है......


9.


शहर के दंगे में
सड़क पर घायल र्इश्वर कराहता है-
मैं खुदा भी हो सकता था
यदि भाषा नें
मार नहीं दिया होता
लड़की उसके पास जाती है
और पूछती है
यह क्या इतना अनिवार्य है कि
तुम्हारी तरह
में भी मारी जाती रहूं
शब्दों के पथराव से !

10.


कि्रयाएं संज्ञा बन गयी हैं
और भ्रम ही शब्द
अन्यथा कहीं भी नहीं थे
स्त्री और पुरुष
जति और धर्म
खुदा और र्इश्वर
सिर्फ भाषा के सिवाय
न ही लड़की.....




अब तक की सबसे अच्छी कविता....



शहर के सबसे बड़े मैदान में
वे वहां एकत्रित हुए
चुनाव करने-
अब तक की सबसे अच्छी कविता
और सबसे बड़ा कवि
अब तक के सबसे सही लोग.....

कविताएं पहले मुगोर्ं की तरह लड़ीं
बहुत पहले भी लड़ा करते थे जैसे मेलों में पशु

कविगण अपनी-अपनी कविताओं को
आवाज लगाते ,चीखते -चिल्लाते
अपनी-अपनी जगहें छोड़कर
उठ खड़े हुए....

कि सबसे पहले अचानक
मैदान के बीच से गुजरा
एक घायल लहूलुहान आदमी
भयानक चीख की तरह
डसे गुण्डों नें मार दिया था छुरा

कविताएं अब गुण्डों की तरह लड़नें लगीं थीं

फिर एक औरत गुजरी-अद्र्ध-विक्षिप्त
फटा ब्लाउज और
तार-तार चीथड़े हुए वस्त्र पहनें....

यह गलत्कार का मामला है
किसी कविता नें कहा
गलत्कारी को सजा मिलनी चाहिए
लेकिन थानेदार भी एक पुरुष है
और उसकी गलत्कार में भी
हो सकती है सहानुभूति !
एक अन्य कविता नें कहा

यह बहस की अच्छी शुरुआत है-
कुछ और कविताओं नें कहा,
हमें सरकार के खिलाफ
आवाज उठानी चाहिए

आखिर जनता
ऐसी निकम्मी सरकार को
चुनती ही क्यों है ?

फिर कविताएं
जासूसी कुत्तों की तरह
अपना सिर झुकाए, जमीन सूंघती
अपने-अपने कवियों के पास
वापस लौट आर्इं.....

यह एक बहुत ही पेंचीदा प्रश्न था
और हम कुछ भी नहीं कर सके-
कविताओं नें कहा, कवियों नें भी






बुढ़ापे का पुत्र

       (एक मित्र की कविता पढ़कर प्रसिद्ध आलोचक की शानदार वापसी पर)

   
          वही दरख्त है
       जिसके नीचे बैठा करता था राजा
       यहां दूर-दूर तक किसी का भी प्रवेश वर्जित था
       मेरे जैसे लोग
       'माथे पर चौखट रखकर चले जाते थे....

मैं जब आया
राजा को छोड़कर चले गए थे
उसके अपने सारे लोग
उसकी तलवार म्यान से बाहर निकलकर
घूल में फिंकी पड़ी थी.....

शहर में अफवाह थी कि मर चुका है राजा
मैंने ऐसे ही जिज्ञासावश उसके चरण छुए
एक इतिहास को प्रणाम करनें के अतिरिक्त
मेरी और कोर्इ भी नहीं थी मंशा
झुकते हुए मैंने उसके चरणों को छुआ
और उसकी सांसे चलने लगीं
राजा जागा
लपककर उसनें उठार्इ अपनी तलवार
बिल्कुल कलम की तरह !

खुशी से पागल नाच उठा मैं
राजा जिन्दा है जिन्दा !
राजा की आंखों से आंसुओं की धार फूट चली
''तुमनें मुझे शापमुक्त किया वत्स !
युग बीत गए
प्रतीक्षा करते
थक आए कोर्इ
छाती जुड़ा गर्इ तुमसे मिलकर
तुम मेरे बुढ़ापे के पुत्र हो
निपूता नहीं मरूंगा मै।
चलेगा मेरा वंश !

कि हे ढिढोरचियों !
दसों दिशाओं का कान पीट दो कि
पुत्र हुआ है मेरे
मेरी 'चुचुकी छातियों में दूध उतर आया है।


मिट चुका होता


सब कुछ मिट चुका होता
यदि कदमों नें मांगे होते जिन्दगी से बने बनाए रास्ते
खुले दरवाजे और अड़ गए होते
बन्द द्वार और
पन्थहीनता का ठहराव लिए !
उजड़ गए होते
जंगल,बन,पलाश
सारे के सारे तब........


हादसा



सब व्यर्थ हुआ
एक बारात-
दूल्हन और
न्यौछावर के फेंके गए
कुछ खनकते सिक्के
बटोरनें में
पूरी की पूरी पीठ़ी
खो गयी......


बदलाव



मौसम जब बदलता है तो
चूहे के बिल में भी बदलता है
चूहे के बिल को छोड़कर
निकल भागता है सांप
चूहा भी बदलता है
बदल जाते हैं लोग-बाग
मौसम जब बदलता है ।



विचार भी एक पर्यावरण है



फिलहाल मैं किसी भी सपने को जी नहीं सकता हूं
मुझे यह भी नहीं मालूम कि
मैं किसी के सपने का हिस्सा हूं भी या नहीं
मैं एक संवेदनशील मन के ददोर्ं को बड़ाना नहीं चाहता
यहां एक आदमी सो रहा है बच्चों की तरह.......

नुकीले चटटान की तरह
चुभ रहे हैं खुरदुरे अहसास
जीवन खा रहा ज्यों ठोकर
बन्द गलियारों में.....
लोगों के चुभते हुए
हिंसक व्यकितयों के बीच से गुजरते हुए
लोगों के पथरीले मन के पर्यावरण से
बचते-बचाते जीने के लिए
गलत विचारों को जी रहे आदिम मसितष्कों का समय
अप्रासंगिक विचारों के खण्डहरों का शहर
आक्रामक हत्यारी इच्छाओं के पशुओं से भरा हुआ.....

जबकि विचार भी एक पर्यावरण है
मैं अपने प्र्यावरण को बदल देना चाहता हूं.......
उनकी इच्छाएं जेबकतरों के उंगलियों की तरह
फिर रही हैं लोगों की उपलबिध्यों की जेब पर
उनकी उंगलियां हत्यारों की तरह बढ़ रही हैं
लोगों की धड़कनों पर......

उनकी इच्छाओं नें जीत लिया है समय
उनकी इच्छाओं नें दूसरों की इच्छाओं को स्थगित कर रखा है !
दर्द इतनें अधिक हैं कि
मैं बाहर का सब कुछ अस्वीकार करता हुआ
सिर्फ अपने सकि्रय असितत्व में डूबा हुआ ही
पार कर पाउंगा बाहर का यह पागल समय
भर पाउंगा अपने भीतर और बाहर की सारी अनुपसिथतियों को
भंग कर पाउंगा अपने भीतर का निष्ठुर एकान्त......

एक अविस्मरणीय इतिहास की तरह
सौन्दर्य में नहीं ,संवेदना में हुआ है
एक साहित्यकार का अन्त !




एक चिटठी



क्या ही अच्छा होता कि
एक चिटठी लिखता
और बदल जाता सारा देश
एक चिटठी मिलती और
फिर से लिखा जाता
देश का संविधान......






त्रासदी पर पुनर्विचार

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

दुर्गा कथा

भाषा विग्यान की दृष्टि से भैस शब्द महिषी का तद्भव है। महिष मे मह धातु के  कारण महा ईश  यानि महेश का ही पर्यायी लगता है।इस तरह इसका सम्भावित अर्थ महान स्वामी ही रहा होगा। संस्कृत मे राजमहिषी माहारानी केअर्थ मे ही प्रचलित रहा है । इसे देखते हुए मेरा मानना है कि लोक ने ही भैस को प्यार से महिषी यानि रानी के समान कहा होगा ।भैसो का एक स्थिर चाल से रानी
के समान चलना भी  इस उपमा का आधार रहा होगा। इसी आधार पर भैंस के पति महोदय भी भैंसा घोषित कर दिया गया।   एक तथ्य यह भी है कि  भारतीय मूल की भैसे भारतीय हाथियों की तरंह अफ्रीकी जंगली  भैंसा से  भिन्न  प्रजाति की है और  कम आक्रामक, मुड़ी सींग वाली  होती हैं।  भैंस पर सवार महिषासुर भी कोई द्रविड़ भारतीय राजा ही रहा होगा। सम्भव  है पश्चिम से आए किसी प्रवासी योरोपीय कबीलाई मूल की रही होगी।  जो लौह युंग के परिष्कृत हथियारों की मदद से उसकी हत्या कर दी हो ।
   इसी तरह दुर्ग  शब्द  यानि किले का मानवीकरण करते हुए उसका स्त्री रूप दुर्गा का विकस किया गया हं। दुर्ग यानि जहाॅ गमन या जाना कठिन हो। इस अर्थ मे दुर्गा दुर्ग की ही अधिष्ठात्री देवी रही है।
 इसे देखते हुए दुर्गा  और महिषासुर की कथा  मुझे कबीलाई युग की किसी  ज़ोन आफ आर्क की आदिम लोक कथा की  स्मृति  का संस्कृतकरण लगाता  है।  इस युद्ध का विजेता  स्त्री पक्ष तो  प्रगतिशील लगता है लेकिन  बलात्कारी  असुर का परमरा से काला होना वर्ण एवं रंगभेद आधारित नस्लीय घृणा की मानसिकता छिपाए लगता है।  जैसा कि मैने दुर्गा नामकरण ही किला युग के बाद का बताया है । बलात्कारी से लड़ने  वाली कोई बहादुर  युवती रही भी होगी तो  भी  दुर्गा नामकरण परवर्ती हीं है।
जो भी हो किसी चरित्र का आधुनिक समाज शास्त्रीय विश्लेषण  तो ठीक  है लेकिन किसी तथ्य को लेकर जब किसी कथा के चरित्र का पाठ बदलने की मांग करें तो इतना अवश्य ध्यान रखें कि नामकरण और  चरित्र यानि कथा में  नकारात्मक चरित्र का  वयवहार दोनों  भिन्न  दृष्टिया है।  किसी बलात्कारी चरित्र को अपना रिश्तेदार घोषित करते समय भी बलात्कार का समर्थन नहीं किया जा सकता है। हाॅ प्राचीनकाल  की जातीय स्मृतियों में सब कुछ जायज  या महान और  पवित्र ही नहीं है। अतीत के मनुष्य की  मूर्खता पर  प्रश्न  उठना सभ्यता के विकसनशील  एवं जीवित होने का सूचक है।

शुक्रवार, 30 जून 2017

मनुष्य और सर्प

कक्षा में गोरखनाथ और कुण्डलिनी से सम्बंधित की गयी अपनी एक टिप्पणी याद आ रही है ,जिसमें मैंने कहा था कि लाखों वर्षों के विकासक्रम में भटकने और बिछुड़ने के बावजूद मस्तिष्क से लेकर पूंछ तक कुत्ता, बिल्ली ,भैस ,शेर,बन्दर और आदमी भी सभी सांप के ही विकासात्मक रूपांतर और विविध रूप लगते हैं | देखा जाय तो सांप का विष भी उसकी लार ही है और इन्सान का विष उसके क्रोध के रूप में उसके दिमाग में चला गया है | वैसे तो वह निर्विष सांप की तरह है ,क्योंकि उसके काटने से कोई नहीं मरता लेकिन उसने मारने के नए तरीके विकसित कर लिए हैं | सांप सरीसृप है ,उसमें अविकसित हाथ और पैर के अवशेष तो मिलते हैं लेकिन पूँछ वाले अन्य जानवरों और आदमी के तंत्रिका तंत्र में हाथ और पैर के लिए दो शाखाओं के रूप में अलग या अतिरिक्त रूप से तंत्रिका तंत्र का विस्तार हुआ है | बाकी सभी कुछ सर्पवत ही है | दो आँखे ,दो नाक ,जीभ फेफड़े ,स्त्री-पुरुष सभी मनुष्य की तरह ही है |
जब कभी मैं किसी को मोटर सायकिल चलाते हुए देखता हूँ और इस नजरिए से सोचता हूँ कि प्रकृति का कैसा चमत्कार है कि सांप की प्रजाति की ही एक शाखा जैविक रूप से विकसित और परिष्कृत होकर आज मोटर सायकिल और वायुयान चला रही है,एक-दूसरे से लड़ते हुए एक-दूसरे की हत्याएं कर रही है तो प्रकृति के विकास क्रम पर रोमांचित और अभिभूत हो जाता हूँ ....
कक्षा में गोरखनाथ और कुण्डलिनी जागरण से सम्बंधित की गयी अपनी एक टिप्पणी याद आ रही है ,जिसमें मैंने कहा था कि लाखों वर्षों के विकासक्रम में भटकने और बिछुड़ने के बावजूद मस्तिष्क से लेकर पूंछ तक कुत्ता, बिल्ली ,भैस ,शेर,बन्दर और आदमी भी सभी सांप के ही विकासात्मक रूपांतर और विविध रूप लगते हैं | देखा जाय तो सांप का विष भी उसकी लार ही है और इन्सान का विष उसके क्रोध के रूप में उसके दिमाग में चला गया है | वैसे तो वह निर्विष सांप की तरह है ,क्योंकि उसके काटने से कोई नहीं मरता लेकिन उसने मारने के नए तरीके विकसित कर लिए हैं | सांप सरीसृप है ,उसमें अविकसित हाथ और पैर के अवशेष तो मिलते हैं लेकिन पूँछ वाले अन्य जानवरों और आदमी के तंत्रिका तंत्र में हाथ और पैर के लिए दो शाखाओं के रूप में अलग या अतिरिक्त रूप से तंत्रिका तंत्र का विस्तार हुआ है | बाकी सभी कुछ सर्पवत ही है | दो आँखे ,दो नाक ,जीभ फेफड़े ,स्त्री-पुरुष सभी मनुष्य की तरह ही है |
जब कभी मैं किसी को मोटर सायकिल चलाते हुए देखता हूँ और इस नजरिए से सोचता हूँ कि प्रकृति का कैसा चमत्कार है कि सांप की प्रजाति की ही एक शाखा जैविक रूप से विकसित और परिष्कृत होकर आज मोटर सायकिल और वायुयान चला रही है,एक-दूसरे से लड़ते हुए एक-दूसरे की हत्याएं कर रही है तो प्रकृति के विकास क्रम पर रोमांचित और अभिभूत हो जाता हूँ ....

सोमवार, 12 जून 2017

राज्य की अवधारणा और लोकतंत्र

व्यवस्था का आदिम कबीलाई ढांचा और उसका अचेतन साथ-साथ जीने के स्थान पर हिंसक ढंग से अपने साथियों(नागरिकों) को जीतने का विधिसम्मत आमंत्रण देता है और फिर शुरू हो जाता है गुलामी और स्वामित्व का मान्यता-प्राप्त आदिम खेल- जिसमें मानवीय समाज और जनसँख्या दबे और दबाने वालों में बाँट दी जाती है | अपेक्षा यह की जाती है कि दबने वाले दबाने वालों का सम्मान एवं अभिवादन करें क्योंकि वे संवैधानिक रूप से दबाने के लिए ही चयनित है | मेरी चिंता और मेरा प्रश्न यह कि जीतने की होड़ को साथ-साथ जीने की होड़ से विस्थापित किया जा सकता है ? हम अपनी सत्ता और व्यवस्था को मध्य-युगीन ढांचे और आदतों से बाहर क्यों नहीं निकाल पा रहे हैं ? क्या राज्य संस्था का चरित्र ही लोकतंत्र विरोधी है ? तब हमें लोकतंत्र की नहीं बल्कि राज्य की अवधारणा ,संरचना एवं चरित्र कि ही पुनर्परीक्षा करनी चाहिए और निकलना चाहिए एक नयी परिकल्पना की तलाश में ...मुझे लगता है एक दिन नागरिक प्रशासन को सभ्य नागरिक समाज और संस्कृति तक पहुंचाना ही होगा ताकि सैनिक बल द्वारा शासित असभ्य एवं असुरक्षित समाज एक अधिक सभ्य स्वयं अनुशासित समाज में रूपांतरित हो सके ...

रविवार, 11 जून 2017

ब्राह्मणवाद :मार्क्सवादी दृष्टि से

हिन्दू-जातीय -ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का एक बड़ा हिस्सा प्रतीकात्मक और काव्यात्मक होने के कारण साहित्यिक महत्त्व का भी है | पूजा-पद्धति में उदात्त भाव-समर्पण और भांति-भांति की सामग्री के माध्यम से प्रकृति से जुड़ने या उसकी और लौटने का भाव भी आकर्षित करता है | यह अभिव्यक्ति मैंने मार्क्सवाद सम्मत मानकर ही की थी | उसका परंपरागत स्वरूप सामन्ती पूंजीवादी युग से पूर्व का है और प्रागैतिहासिक आदिम मनुष्य तक भी पहुंचता है | इसीलिए इसके कुछ हिस्से से मुझे मार्क्सवाद का विरोध नहीं लगता | दान को महिमामंडित करने के कारण पूँजी-संग्रह का विरोध और वितरण को प्रोत्साहित करने के कारण भारतीय धार्मिकता में भी एक भिन्न किस्म का आर्थिक आदर्शवाद रहा है | लेकिन इसी ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद का एक गर्हित और निकृष्ट पक्ष भी सामने आता है जो इसका सामंतकालीन कुलीनतावादी वर्णवादी चेहरा है | इसमें आम जीवन के महत्त्व और दिव्यता का व्यापक निषेध मिलता है | ईश्वरता को कुछ कुलीन राजघरानों में ही सीमित कर दिया गया है | निर्धनता और हीनता को पूर्व जन्म के पाप से जोड़ दिया गया है | पूंजीपतियों एवं आभिजात्य वर्ग की शोषक श्रेष्ठता को भी आध्यात्मिक स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है | वर्ण व्यवस्था के साथ दुर्भाग्य को नियति और प्रारब्ध से जोड़ दिया गया है |यहीं से ब्राह्मणवाद गर्हित हो जाता है और निंदनीय भी है; क्योंकि वह मध्ययुग में आकर यथास्थितिवादी ,अप्रतिरोधी एवं भेदभाव आदि को बढ़ावा देते हुए मानवताविरोधी हो जाता है | इन दोनों चेहरों को देखते हुए ही हमें अपनी सम्यक धारणा बनानी चाहिए |

गुरुवार, 8 जून 2017

रावण : एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण

 संस्कृत में रावण रचित शिव-स्त्रोत उपलब्ध है और वीर रस से भरा बड़ा ही रोमांचक है |  |परंपरा यह मानती है कि रावण एक अच्छा कवि भी था | उसकी गलती इतनी ही थी कि वह माँ के कुल से अनार्य था और सीता के प्रेम में पड गया था और सही-गलत सब भुला बैठा | राम को रिश्तेदार बना लेने के लिए अपनी बहन सूपर्णखा भेजी तो उसे कुरूप बना कर वापस कर दिया गया | अपने बहन के अपमान का बदला लेने का उसने एक असफल प्रयास किया | यहाँ तक वह ठीक था लेकिन जब उसने राम के स्थान पर राम की निरपराध स्त्री सीता को उसकी सजा देनी चाही तो तत्कालीन समाज नें उसका साथ ही छोड़ दिया | यद्यपि यह एक सच है कि शिव का धनुष तोड़ कर शिव के अनुयायी समुदाय को आर्यों नें अपमानित किया था और वह भी रावण को विवाह में आमंत्रित कर उसके सामने धनुष तोड़वा कर |इस तरह आज के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में रावण का भी एक न्यायिक पक्ष बनता है | 

पाठकनामा


मार्क्सवाद का राजनीतिक और सांस्कृतिक पाठ : ब्राह्मणवाद के सन्दर्भ में

मुझे लगता है कि कुछ समयं तक मार्क्सवाद को सिर्फ व्यवस्था और राजनीति तक ही सीमित रखना था | उसकी सांस्कृतिक असहिष्णुता जो कुछ-कुछ मूसा के यहूदी धर्म और इस्लाम जैसी रही -उसे ले डूबी | अरे भाई तुम शोषण-मुक्त व्यवस्था बनाते -सिर्फ रोजीरोटी और बराबरी देने के नाम पर सोवियत रूस से लेकर भारत तक हर जगह सभी के सांस्कृतिक स्मृति के विलोपन की बात करने लगे | अब सभी सभ्यताओं का अतीत धार्मिक है | धर्म के वैचारिक उच्छेद के कारण अतीत की सारी स्मृतियाँ ही बिना सामानांतर वैकल्पिक विकास के ही उच्छेद योग्य घोषित कर दीी गयीं | कई ऐसे धार्मिक मेले हैं जिनकी इलाके में जन-मन की नीरसता को दूर करने में समाज-मनोवैज्ञानिक भूमिका भी है | होली जैसा विशुद्ध मौज-मस्ती का पागलपन के दौरे जैसा अद्भुत अतार्किक पर्व है | स्वयं को ,मार्क्सवादी घोषित कीजिए और मनहूस की तरह जाकर घर में बैठ जाइए | इसीलिए मैं हमेशा ही मार्क्सवादी दृष्टि और बोध को स्वीकार करते हुए भी उसकी संगठनात्मक असहिष्णु ,हिंसक किस्म का शुद्धतावाद और उसको बिना किसी प्रश्न किए तुरंत सही मान लेने के शत-प्रतिशत समर्पण की माँग से असहमत होने के कारण विवेक की नैतिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए स्वयं को सामुदायिक मार्क्सवादी घोषित करने से बचता रहा | यह कोई भी देख सकता है कि मेरे विश्लेषण और स्थापनाओं की पृष्ठभूमि में मार्क्सवाद की समझ भी अनिवार्य रूप से रहती है | फिर भी विचारधारात्मक रुढ़िवाद का मैं विरोधी हूँ और मुझे लगता है कि मानवता के विवेकपूर्ण भविष्य के लिए तथा ईमानदार विचारक होने की स्वतंत्रता के लिए दक्षिण-पंथ और वामपंथ दोनों ही अँध-भक्त समूहों से ही उचित दूरी बनाए रखनी होगी |
               दरअसल राजनीतिक कारणों से ही( जिसमें साम्यवादी कांग्रेसी सेक्युलरवादी ,दलित और पिछड़ी की राजनीति करने वाली सभी दलों की विचारधारा सम्मिलित है ) ब्राह्मण वाद और हिन्दू धर्म पर भी कभी ठीक से मार्क्सवादी आधारों पर वैचारिक बहस नहीं हुई है | संस्कृत भाषा और भाषा-विज्ञान के उन्नत विकास के कारण ब्राह्मणवादी कर्मकांड का एक बड़ा हिस्सा प्रतीकात्मक एवं काव्यात्मक भी है  |
इन कर्मकांडों का एक बड़ा हिस्सा प्रतीकात्मक और काव्यात्मक होने के कारण साहित्यिक महत्त्व का भी है | पूजा-पद्धति में उदात्त भाव-समर्पण और भांति-भांति की सामग्री के माध्यम से प्रकृति से जुड़ने या उसकी और लौटने का भाव भी आकर्षित करता है | समाजशास्त्रीय दृष्टि से उसमें आदिम मनुष्य की कविता और उदात्त समर्पण की भावना भी छिपी हुई है | यह उसका साहित्यिक गुणवत्ता वाला पक्ष है और मुझे नहीं लगता कि उसका अनावश्यक विरोध किया जाना चाहिए | यह पक्ष मुझे मार्क्सवाद का विरोधी नहीं लगता | उसका परंपरागत स्वरूप सामन्ती पूंजीवादी युग से पूर्व का भी  है और प्रागैतिहासिक आदिम मनुष्य तक भी पहुंचता है |  दान को महिमामंडित करने के कारण पूँजी-संग्रह का विरोध और वितरण को प्रोत्साहित करने के कारण भारतीय धार्मिकता में भी एक भिन्न किस्म का आदर्शवाद रहा है | लेकिन इसी ब्राह्मणवाद और पुरोहितवाद का एक गर्हित और निकृष्ट पक्ष भी सामने आता है जो इसका सामंतकालीन कुलीनाताचादी चेहरा है | इसमें आम जीवन के महत्त्व और दिव्यता का व्यापक निषेध मिलता है | ईश्वरता को कुछ कुलीन राजघरानों में ही सीमित कर दिया गया है | निर्धनता और हीनता को पूर्व जन्म के पाप से जोड़ दिया गया है | पूंजीपतियों एवं आभिजात्य वर्ग की शोषक श्रेष्ठता को भी आध्यात्मिक स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है | वर्ण व्यवस्था के साथ दुर्भाग्य को नियति और प्रारब्ध से जोड़ दिया गया है |यहीं से ब्राह्मणवाद गर्हित हो जाता है और निंदनीय भी है क्यों कि वह मध्ययुग में आकर यथास्थितिवादी ,अप्रतिरोधी एवं भेदभाव आदि को बढ़ावा देते हुए मानवताविरोधी हो जाता है | इन दोनों चेहरों को देखते हुए ही हमें अपनी सम्यक धारणा बनानी चाहिए || वैसे भी सांस्कृतिक कार्यक्रम फुरसत की आस्वाद धर्मिता का हिस्सा हुआ करते हैं | भोजन से लेकर भजन तक वे भी मानवीय सृजनशीलता का एक पाठ प्रस्तुत करते हैं | चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी संप्रदाय और सूफी संगीत में दिल को छू लेने वाली ऐसी ही मौलिक सृजनशीलता मिलाती है | इसीलिए ऐसे विरोध को मैं गैर-जरुरी घृणा का विस्तार मानता हूँ | जब आप एक बार किसी से घृणा करने लगते हैं तो उसकी अच्छी बातें भी आपको बुरी लगने लगती हैं| मनुस्मृति की बहुत सी बातें भारत के बौद्धों के उच्छेद काल से जुडी और उसका राजनीतिक साजिशी पाठ प्रस्तुत करती हैं | पहले के लोगों द्वारा ऐसे षडयंत्र को समझ पाना संभव नहीं था | आज तो कोई भी ब्राह्मण घराने में जन्मा युवक उन साजिशों को समझ सकता है | यदि ऐसा होता तो अवर्ण-सवर्ण का भेदभाव अप्रासंगिक होता लेकिन ...|?
              यह एक सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक सच्चाई है कि यदि कोई प्राचीन शैली की पूजा करता है और ब्राह्मण बिरादरी से है तो पुरखों की परंपरा और लिखित स्मृतियों का उत्तराधिकारी दबाव ज्यादा होने के कारण उसका संरक्षणवादीो और समर्पणवादी होना आश्चर्य का विषय नहीं है | ब्राह्मणवाद (पुरोहितवाद) की निंदा का आधार उसका असमानतावादी जातीय पूर्व्बग्रह होना चाहिए न कि उसका साझा सांस्कृतिक पाठ जिसमें लम्बे भारतीय जीवन के अनुभव समाए हुए हैं | यह एक मार्क्सवाद सम्मत तथ्य है कि सामंती पूंजीवाद ने ही उन सभी अवधारणाओं और नैतिक मूल्यों का विकास किया है जो आज भी हमारे सभी समाज की संरचना और व्यवस्था के आधार है | अब राम की भक्ति को ही ले लीजिए -यह कथा एक पत्नी विवाह और पारिवारिक एकता को प्रोत्साहित करती है | यह सच है कि मध्य काल में इसके प्रचार-प्रसार का ठेका ब्राह्मण जातीय बुद्धिजीवियों के पास रहा है | इसी तरह शिव शूद्र पौराणिक नायक है | ईमानदारी से सवर्ण इसे स्वीकार कर लें और उसका प्रचार करें तो शूद्रों को सिर्फ रविदास और अम्बेडकर से ही काम चलाना नहीं पड़ेगा | ब्राह्मणवाद से मोक्ष के लिए भी उसको ठीक-ठीक समझना होगा | जातीय विद्वेष के आधार और सांस्कृतिक दाय दोनों को ही अलग-अलग और सही-सही समझने-समझाने की जरुरत है |
              सिर्फ पीपल का ही उदहारण ले लें तो नास्तिक भाव से भी चिड़ियों की बीट से उगे इस पौधे को उखाड़ कर उसे बड़ा होने तक सिचित करने की जरुरत है | धार्मिक बड़े पेंड़ को बिना मतलब सींचता है तो नास्तिक विवेक से छोटे पोधे को सींचे -लेकिन सींचे तो | जीवन का सूना क्षितिज भरने और बहुरंगी बनाने में प्राचीन मनुष्य की सृजनशीलता का अपना महत्त्व है \आत्मस्थ निष्क्रिय चिंतकों की कोई सांस्कृतिक भूमिका नहीं बनती |प्राचीन काल के भी गुफा गेही ऋषियों (पुरखे बुद्धिजीवियों ) को भुला दिया गया | सांस्कृतिक नायक वाही बने जिन्होंने लोक के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर साझा जीवन जिया | इसलिए कट्टर बुद्धिवादी भी अपनी सीमा को समझें और हो सके तो नए पर्व और उत्सव पैदा करें |बिना विकल्प दिए जीवन को नीरस बनाना समझदारी नहीं है |

शनिवार, 27 मई 2017

काशीनाथ सिंह का' उपसंहार' उपन्यास

काशीनाथ सिंह के उपन्यास 'उपसंहार 'को पढ़ते हुए मुझे लगातार नामवर सिंह याद आते रहे | मुझे लगता रहा कि काशीनाथ सिंह ने प्रसिद्धि की कीमत पर नामवर जी की गृह-कथा -अपने ही स्वजनों की असंतुष्टि और नाराजगी को कृष्ण कथा के माध्यम से आत्म -प्रक्षेपित किया है | हर सार्वजनिक व्यक्तित्व कहीं न कहीं पारिवारिक और निजी जीवन के मोर्चे पर हारता और स्वयं को घायल करता रहता है | 'उपसंहार' उपन्यास का सबसे कमजोर बिंदु यह है कि इसमें कुछ पौराणिक अंधविश्वासों का ज्यों का त्यों इश्तेमाल कर लिया गया है और सबसे ताकतवर पक्ष यही है कि इसमें कृष्ण के बहाने नामवर सिंह की प्रसिद्धि ,मनोदशा और नियति पर निवेश रूप में एक व्यंजनाधर्मी सूक्ष्म विश्वसनीय विमर्श उपस्थित है |दरअसल 'उपसंहार 'के कृष्ण (और वास्तविक जीवन में नामवर दोनों ही ) सामंती शैली की अभिजन श्रेष्ठता को जीते हैं और गणतंत्र /लोकतंत्र के बावजूद अपने समुदाय को अपने निर्णयों पर इतना आश्रित बनते जाते हैं कि अंत में लोगों को नालायक बनाता हुआ ईश्वरीय छवि में लिपटा व्यक्तिवाद ही बचता है | यह असम्वादी व्यक्तिवाद ही कृष्ण का एकाकी अभिशप्त अकेलापन है (और हिन्दी साहित्य में संभवतः नामवर का भी ) इस उपन्यास में खुलकर तो नहीं लेकिन दबे सांकेतिक रूप में ब्राह्मणवादी छवि निर्माण पर टिप्पणियां उपलब्ध हैं | काशीनाथ सिंह के इस उपन्यास की इस दृष्टि से प्रशंसा की जानी चाहिए कि यह कृष्ण के लौकिक से लोकोत्तर बनने-बनाने की प्रक्रिया में कृष्ण के असमाजीकरण और अमानवीकरण का गंभीर एवं सजग चित्रण करते हैं | दुर्वासा द्वारा कृष्ण को नंगा होकर खीर पोतने का आदेश देना ऐसा ही ब्राह्मणीकरण करने वाला प्रसंग है ,जिसे कृष्ण व्यवस्था का अंग बन जाने के बाद निस्तेज भाव से किसी आज्ञाकारी शिशु की भांति स्वीकार करते हुए दिखाए गए हैं | कृष्ण के चरित्र को देखते हुए यह पौराणिक प्रसंग प्रक्षेपित लगता है और वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मण दुर्वासा को सामंती-अवतारी कृष्ण से भी सर्वोपरि सिद्ध करता है | आखिर ईश्वर बनाने और घोषित करने वाला वर्ण ईश्वर बनने वाले वर्ण से ऊपर और श्रेष्ठ होना ही चाहिए | कृष्ण यदि यहाँ विद्रोह कर देते या इनकार कर  देते तो उनका ईश्वर-पद छीना जाना तो तय ही था | फिर अवतारी कृष्ण को मृत्यु  जैसे घोर पार्थिव सत्य का भी सामना करना था | ब्राह्मण दुर्वासा द्वारा अमर बनाने वाली इस खीर के लेपन से कृष्ण का तलवा छूट जाता है और वहीँ से वे व्याघ्र द्वारा मार दिए जाते हैं | कोई चाहे तो दिव्य बनाने की इस इंजीनियरिंग को भी अपने विमर्श में शामिल कर सकता है | 

बुधवार, 17 मई 2017

ईश्वर और पर्यावरण

ईश्वर और पर्यावरण
( भारत और पाकिस्तान के विभाजन से सम्बंधित स्वर्गीया गुरुशरण कौर के संस्मरणों के आधार पर )

एक सुबह पता चला कि ईश्वर खिसक गया चुपके से
या फिर बदल गया है
लोगों के हाथों में उग आए हैं घातक हथियार

खुशी के घोड़े पर बैठकर गश्त लगाता हुआ
अपनी श्रेष्ठता के दम्भ पर इतराता आसमान
भहरा कर गिर पड़ता है एक दिन
अपनी-अपनी पुश्तैनी हवेलियों और
जलते हुए चूल्हों को छोड़कर
डरे हुए चूहों की तरह निकल भागते हैं लोग
भोली आस्था पर टूट पड़ता है इतिहास डकैतों की तरह....
आस्था का सर्वशक्तिमान ईश्वर  पिछड़ जाता है
अनपढ़-असावधान आस्थाओं से खेलने वाले राजनीतिज्ञों से....

जिन्ना की कुंठित महत्त्वाकांक्षाओं ने ढक लिया है उनके प्रार्थना के ईश्वर को
और छीन ली है पूर्वजों से मिली स्मृतियों की जड़ें
माउण्टबेटन के साथ पी गई शराब की चुस्कियों में डूबकर
बन्द कमरे में रेखाएं खींचने वाली कलम
उनकी धरती को किसी आलू पर रखी गई तलवार-सा चीर देती है.......
कि एक सुबह सूख जाता है
सूफियाने-सयाने सन्तों की वाणी का दिव्य-पवित्र प्रवाह
और सतलज ,रावी,व्यास,चिनाब एवं सिन्धु नदी की धाराए
पीकर वमन करने लगती हैं मानव-रक्त का....

कि एक सुबह घायल ईश्वर भाग खड़ा होता है
भीड़ और भगदड़ के बीच अपने प्यारे निरीह बन्दों को
अकेले निरुपाय लुटने-पिटने और मरने के लिए छोड़कर.....
एक-दूसरे की खून की प्यासी देहों को
युद्ध में क्षतिग्रस्त हुए हवाई अड्डों की तरह छोड़कर
ईश्वर खिसकता जाता है चुपचाप
लोगों की बुझती हुई संवेदनाओं के साथ
जैसे बुझता हुआ दीपक
घिरता जाता है अन्धकार से

एक दिन किसी ठगी हुई विकलांग आत्मा की रक्तरंजित स्मृतियों के साथ
किसी पीड़ादायक दुःस्वप्न की तरह याद आता है ईश्वर
उन झूठी पड़ गयी प्रार्थनाओं के रूप में
जो अनसुनी कर दी गयी थीं
सुख की सारी भाग्य-रेखाओं के ऊपर
एक हिंसक मानवीय पर्यावरण द्वारा पोत दिया गया था
खून को रंग की तरह......

अब बचा हुआ ईश्वर यदि कहीं है तो
सिर्फ दुःख और करुणा के रूप में है
असमय छीन ली गयी स्मृतियों की उन कटु यादों के रूप में है
जिन्हें न तो धोया जा सकता है और न ही बदला
उस उदास थके मन के रूप में है
जो अकारण पसीज-पसीज उठता है
दूसरों को दुखी देखकर
बार-बार ठगा जाता रहता है
दूसरों के प्रति अपने सहानुभूतिशील मन के साथ....
अनजाने में रचता जाता है एक सुखमय ईश्वर
दूसरों के असुरक्षित जीवन के लिए
जैसे तलवारों के वार के सामने ढाल बनकर खड़ा हो जाता है....

कुछ ऐसे कि बड़ी आत्माएं प्रायः मूर्ख हुआ करती हैं
लेकिन हिम्मत के साथ.....
करती जाती हैं दूसरों को अच्छा समझने की एकतरफा मूर्खताएं
और हर बार फिर ठगे जाने पर यह सोचकर वे चुप लगा जाते हैं
कि अब भी नहीं सुधरा......
पुकारते रहते हैं अविश्वासी लोगों को
अपने विश्वासी और करुणाशील ईश्वर की ओर
धूर्त आस्था के ईश्वर को किसी लाचार-व्यसनी मच्छर की तरह
बर-बार काटने के लिए छोड़कर
या किसी सिंह की तरह उसे उसके जीवन के लिए आवश्यक
आदिम हिंसा में- जो अपनी छोटी नन्हीं आंत के कारण
बकरी की तरह घास खाने पर मर ही जाएगा......

हम सबसे अच्छा जब जी रहे होते हैं तो
सृजन की एक अन्तहीन-अनथक दौड़ में होते हैं
अपने अभावों की पूर्ति के लिए
जब हम अपने लिए भी रच रहे होते हैं
सौंप रहे होते हैं  दूसरों को भी
कुछ प्रेरणाएं ...कुछ रास्ते.....कुछ आदतों का संसार
हर पल नई आती हुई दुनिया के नाम.......

कि हम जब भी बदल रहे होते हैं अपनी नियति
बदल रहे होते हैं अपना ईश्वर
कि हमारा भी रचा हर पर्यावरण
हमारे लिए रच रहा होता है एक नया ईश्वर
और इस तरह कई-कई ईश्वर को बदलते और जीते रहते हैं हम.......

कि कभी हम एक पिता पर्यावरण में होते हैं
अपने सुख-दुख और आदतों के साथ
जब एक पिता पीढ़ी द्वारा प्रदत्त पर्यावरण को
पिता ईश्वर की तरह जीते-मरते रहते हैं.....

कभी-कभी तो हम बलात् निकाल दिए जाते हैं बाहर
अपने पिता पर्यावरण से
हम अपने ईश्वर को पिछड़ते और बिछड़ते हुए देखते रहते हैं
हम निकल जाते हैं अभावों की कटु सच्चाइयों की  कड़ी धूप में
उदासी के अन्तहीन शून्य में निर्ममतापूर्वक फेंक दिए जाते हैं हम.....

कि दूसरों की दुर्भावनाओं और साजिशों के माध्यम से
हमारे सुख-सौभाग्य को छीन लेने वाला ईश्वर
जीवितों के नर्क में बदल देता है हमारे पर्यावरण को
हम ईश्वर के पर्यावरण से वंचित
बिना ईश्वर के हो जाते हैं
जैसे सभ्यता से मारकर खदेड़ दिया गया व्यक्ति का जीवन
एक हतप्रभ विलाप में बदल जाता है....

हम जब बलात् निकाल दिए जाते हैं
अपने पिता पर्यावरण से बाहर
फिर तो हमें रचना ही पड़ता है
अपना अलग पर्यावरण और अपना अलग ईश्वर भी.......  

इसतरह अपने अनुभवों के प्रतिरोध से हम बचा सकते हैं
दूसरों के सपनों में पल रहा ईश्वर
अपना सब कुछ खो देने के बाद भी
एक लुटेरे और हिंसक ईश्वर के खिलाफ
हम रच सकते हैं अपना नया और संशोधित ईश्वर
कुछ ऐसे कि जब हम अपने पर्यावरण को बदलते हुए
अपनी नियति को बदल रहे होते हैं
बदल रहे होते हैं अपना ईश्वर......

हम जो रच सकते हैं ईश्वर
यानि कि ईश्वरत्व हममे हैं
हम हो सकते हैं ईश्वरत्व के प्रतिनिधि
अपनी समर्थ ,सक्रिय और सृजनशील करुणा से
सींच सकते हैं सभी सूखी आत्माओं को.....
उसके जीवित विकल्प की तरह......

कि अन्ततः हम भी एक फसल हैं
सोचने -समझने वाली फसल
स्वयं को धन्य और दूसरों को अन्य कहते हुए
गेहूं से लेकर सूअर तक फैले अपने जैविक-जीनोमिक रिश्ते को झुठलाते
बकरी की देह और मन को मरने की चीज
और उसके वजूद को सिर्फ खाने के लिए कहकर
किसी उपजाऊ फसल की तरह ही
हम खिला-खिलाकर मुर्गियों की देह में
उगाते रहते हैं अण्डे....अण्डे....मोर एण्ड मोर अण्डे....

जैसे इमली में बनता है टार्टेरिक एसिड
और नीबू में सायट्रिक
जैसे सांप की विष-ग्रन्थियों में
हमारी लार की तरह ही भरता रहता है विष
हमारी देह भी एक फसल है सोचने वाली.....

हाँ...हमें अपनी जाति की अमरता को
बचाए रखने के लिए
अपनी जाति को बचाए रखना होगा
ताकि बनते-बिगड़ते समीकरणों के साथ
क्या पता हमारा जीन एक बार फिर दुहरा जाय
हजारों वर्ष पहले जन्में किसी
माननीय पूर्वज के ईमानदार जीन से
या बदलकर पूरी तरह नया हो जाय वह
और एक ऐसा मनुष्य जन्म ले
जैसा पहले कभी नहीं जन्मा.....

जब हम आने वाली पीढ़ी के लिए
रच रहे होते हैं एक सुरक्षित पर्यावरण
सौंप रहे होते हैं सुख,साधनों और सुविधाओं की नियति
सौंप रहे होते हैं किसी ईश्वर की तरह......

इस तरह ईश्वर की निष्क्रिय तलाश से अधिक महत्वपूर्ण हैं
ईश्वर बनना .......स्वयं को प्रस्तुत और उपलब्ध करना 
एक  नए बेहतर और महान विकल्प के नाम ...

जबकि दुनिया में एक भी अच्छे आदमी का बचे रहना
ईश्वर और ईश्वरता के होने की संभावनाओं का भी बचे रहना है
इसलिए ईश्वर न भी हो

एक अच्छे आदमी का होना ईश्वर का होना है !