रविवार, 28 अक्टूबर 2012

कविता में किसान


अभिनव कदम - अंक २८ 
संपादक -जय प्रकाश धूमकेतु में प्रकाशित 
                                            
हिन्दी कविता में किसान-जीवन और यथार्थ की उपसिथति-अनुपसिथति के बढ़ते-घटते ग्राफ को समझने के लिए हमें साहित्य से पहले हिन्दी-क्षेत्र के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र को समझना होगा । यह एक दुखद सच्चार्इ है कि औधोगिककरण,शहरीकरण,बाजारवाद और भूमण्डलीकरण की दिशा में हुए देश के विकास तथा सरकारी नीतियों नें एक पेशे के रूप में किसान जीवन को अप्रतिषिठत किया है । इस सच्चार्इ का एक दूसरा पहलू यह है कि ह रित क्रानित के बाद आर्इ खाधान्न की उपलब्धता  से उपजी सुरक्षा और निशिचंतता  नें उदासीन करते हुए मीडिया और साहित्य से किसान-चर्चा को बाहर कर दिया है । भारत में संयुक्त परिवार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण  परम्पराजीवी  आम आदमी अब भी अपने पारिवारिक सदस्यों का नैतिक रूप से आर्थिक और सामाजिक सहयोगी बना हुआ है । पशिचमी देशों से अलग बेरोजगारों , कुणिठतों और पागलों तक का भरण-पोषण एवं चिकित्सा-व्यय भारत में सरकार नहीं बलिक परिवार संस्था ही कर रही है । परिवार का कमाऊ सदस्य प्राय: अपने हिस्से की जमीन इसी नैतिक दबाव के कारण ही परिवार के असफल एवं बेरोजगार सदस्यों के हवाले कर देते हैं  । सिर्फ इतने पर ही सन्तोष कर लेते हैं कि जमीन अब भी उनके नाम से सरकार के यहां दर्ज है । यह सांस्कृतिक पोषण ही किसान यथार्थ की विभीषिका को कम करके दिखाती है । यही राजनीतिज्ञों की संवेदनशून्यता के भयावह दुष्परिणामों को भी पूरी तरह फलित होने से देश को बचाए हुए है ।  प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष व्यकित को मिलने वाला यह पारिवारिक संरक्षण असन्तोष और अवसाद को क्रानित की उस सीमा तक नहीं पहुंचने देता ,जिसकी प्रतीक्षा देश की वामपन्थी पार्टियां लम्बे समय से करती आ रही हैं ।

     किसान असन्तोष को कम करने वाला एक और निर्णायक प्रभाव रामकथा का भी है । औधोगिककरण और बाजारीकरण के भारी दबाव के बावजूद रामकथा अब भी एक प्रभावकारी सांस्कृतिक-सामाजिक प्रेरक शकित के रूप में पारिवारिक व्यवहार और आर्थिक सम्बन्धों का संविधान रच रह ी है । इसीलिए हिन्दी कविता में किसानों की सिथति का विश्लेषण तुलसी के राम से ही आरम्भ करना उचित होगा । तुलसी के राम किसानी तो नहीं करते लेकिन उस बीज संस्कृति का निर्माण अवश्य करते हैं ,जिसपर भारतीय किसान जीवन का पूरा अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र टिका हुआ है । रामकथा कृषिभूमि का पारिवारिक विभाजन रोकती है । परिचार में सामूहिक खेती की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तैयार करती है । कम भोगलिप्सा वाले सन्तोषी जीवन की प्रेरणा देती है । रामकथा के बल पर ही भारतीय किसान कम जीवन-स्तर पर भी बिना असन्तुष्ट हुए जीता रहता है । इस दृषिट से रामकथा भारतीय कृषि-सभ्यता के लिए अत्यन्त आवश्यक आधार-महाकाव्य है । उसी के प्रभाव से ग्रामीण किसान जन-जीवन को संरक्षण सरकार से नहीं बलिक संयुक्त परिवार के उन सामाजिक रि श्तों से मिलता रहा है ,जिसके कारण बाहर जाकर नौकरी या व्यवसाय से अधिक अर्जन करने वाला परिवार का सदस्य किसानी में लगे अपने स्वजन के हवाले अपने खेत कर ही देता है ,भले ही वह भरत को दिए गए खड़ाऊं की तरह धरोहर के रूप में ही क्यों न हो ।  रामकथा आज भी उन्हें परदेशी भार्इ के हिस्सों को हड़पने से भरत की तरह रोकती है । बाहर कमाने के लिए हुए भारी संख्या में निर्वासन या पलायन नें गांव में रहकर कृषि-कार्य में लगे हुए सदस्यों को कुछ राहत तो दिया है । अब बाहर मुम्बर्इ या गुजरात कमाने गया पूर्वी उत्तर-प्रदेश  या बिहार का कोर्इ व्यकित अपने घर से गेहूं तो नहीं ही मंगाएगा । इस भारतीय संकोच नें ही किसानों की आर्थिक और सामाजिक क्षतिपूर्ति की है ।

      अब प्रश्न यह उठता है कि वास्तविक किसान समस्या है किस रूप में तो हमें समझना होगा कि सौ कुन्तल गेहूं उपजाने वाला किसान भी,जिसे बड़ा काश्तकार कहा जाएगा ,वर्ष में एक फसल लेने की सिथति में एक लाख से  डेढ़ लाख रुपए तक की ही आय कर सकता है । यदि वर्षा ऋतु की दूसरी फसल धान आदि की आय भी जोड़ दे ंतो यह बाजार-भाव के हिसाब से दो से तीन लाख की आय ही होती है । इस आय को नौकरी से लिने वाले वेतन में बदलें तो लागत घटाने के बाद उसकी आय चपरासी या क्लर्क को मिलने वाले वेतन के बराबर ही होगी । उसकी मासिक आय पन्द्रह से लेकर तेर्इस हजार के आस-पास ही पहुंचेगी ।

     यह सिथति तब है जब उसके पास पन्द्रह-बीस एकड़ खेत की उपज हो ।  संभवत: यही कारण है कि परिवार में सिर्फ बेरोजगार और असफल सदस्य ही किसान जीवन अपनाते हैं । आज की तारीख में किसान बनना दूसरों की सहानुभूति का पात्र होना और कुणिठत होना है । ऐसी सिथति में कोर्इ कवि,भले ह ीवह गांव से ही भागकर दिल्ली आया हो,किसान-जीवन का कैसे भव्यीकरण करेगा ?

    भारतीय किसान इसलिए पल जाता है कि वह बाजार की मुद्रा के बल पर नहीं बलिक श्रम से अर्जित उपज से भोजन प्राप्त कर सकता है । विवाह आदि में दहेज जैसी कुरीतियों से निपटनें के लिए उसे या तो खेत बेचना होगा या फिर अनाज । वह अपना जीवन-स्तर घटाकर ही सुरक्षित जीवन-यापन कर सकता है । किसान-यथार्थ के प्रति इस समझ को लेकर जब हम हिन्दी कविता की पड़ताल करते हैं तो ऐतिहासिक दृषिट से यह साफ-साफ दिखार्इ देता है कि भारत के विकसित राष्æ बनने के साथ-साथ बढ़ती उपज और खाधान्न सुरक्षा नें कविता से किसानों को क्रमश: निर्वासित ही किया है । प्रगतिवाद के बाद प्रयोगवाद और फिर नर्इ कविता का आन्दोलन नएपन की खोज में शहरी मध्यवर्गीय जीवन और अनुभूति की सामूहिक अभिव्यकित के रूप में सामने आता है । इस दौर में अपवादस्वरूप ही किसान जीवन से सम्बनिधत कविताएं मिलती हैं । कविता विषय और शिल्प दोनों ही स्तरों पर मनोवैज्ञानिक और संशिलष्ट होती गयी है। धूमिल तक आते-आते तो वह बिम्बात्मक चिन्तन की भाषा में व्यक्त होने लगती है ।  यह निरीक्षण महत्वपूर्ण है कि केदारनाथ सिंह की बाघ कविता में बाघ किसान को  æैक्टर चलाते बहुत दूर से देखता है। यह एक यानित्रक दुनिया का किसान है और स्वाभाविक है कि कविता के बाघ के साथ-साथ कवियों को भी उस प्राकृतिक राग से दूर कर देता है ,जो कुछ ही समय पूर्व तक केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में पूरी उत्सवधर्मिता के साथ व्यक्त हुर्इ है । अब वह एक लुप्त होती प्रजाति और विनाश के रूपक में ही कविता में लौट सकता है और वह इसी त्रासद रूप में लौटा भी है ।  कहीं कालाहांंडी तो कहीं विदर्भ के रूप में ।

           हिन्दी कविता में किसान की उपसिथति को ऐतिहासिक सर्वेक्षण के रूप में देखें तो वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में मिलता है । कहीं पूरे जीवन और परिदृश्य के साथ तो कहीं कविता के बिम्ब और भाषा के शिल्प या माध्यम के रूप में । अप्रत्यक्ष उपसिथति वाली कविताएं किसान अनुभव और संवेदना को किसी अन्य दार्शनिक संदेश या भावबोध में रूपान्तरित करती हैं । ऐसी कविताएं सबसे अधिक संख्या में भवानीप्रसाद मिश्र के यहां मिलती हैं ।  हिन्दी कविता के इतिहास में जाने पर किसान-यथार्थ की सबसे पहली तलाश स्वाभाविक है कि भारतेन्दु जी के यहां से ही शुरू हो । भारतेन्दु जी किसान जीवन से उदासीन नहीं थे । वे किसानों की दीन दशा से परिचित भी थे ,जैसा कि निम्न पंकितयों से पता चलता है-

    ''मरी बुलाऊं देस उजाड़ूं मंहगा करके अन्न

     सबके ऊपर टिकस लगाऊं धन मुझको धन्न

     मुझे तुम सहज न जानो जी,मुझे राक्षस मानों जी ।

ल्ेकिन आम धारणा के विपरीत उत्सवधर्मी और मनमौजी प्रतिभा के धनी भारतेन्दु जी का ब्रजभाषा में रचा गया काव्य-साहित्य कृष्ण जू और राधा जू के लीला गान से ही भरा पड़ा है । कल्पना की जा सकती है कि ऐसा उन्होंनें अपने नए-नए पदों को शाम की गोष्ठी में साहितियक अभिरुचि वाले नगर श्रेषिठयों को सुनाने और उनसे वाह-वाह सुनने के लिए ही किया होगा । वे जिस व्यवसायी वर्ग से स्वयं भी आते थे ,वहां स्रोताओं की प्राथमिकता धार्मिक रचनाएं सुनने की ही रही होगी । यह भी संभव है कि कहीं अचेतन में सूर से प्रतिस्पद्र्धा भी रही हो-आखिर प्रतिभाशाली तो थे ही ।यह भी कि भारतेन्दं का युग सांस्कृतिक जीवनयापन का युग था । किसान जीवन उनके युग का इतना सर्वव्सापी स्थूल सच था कि उसे व्यापक रूप् से कविता का विषय बनाने के बारे में सोचना उनकी मनोवैज्ञानिक बनावट में ही नहीं था ।  दरअसल वे नागरिक जीवन-बोध के कवि थे । ऊपर की पंकितयों में भी संभवत: वाराणसी जैसे महानगर में रहने के कारण ही कृषि-उपज के बाजार-मुल्य तथा किसानों के प्रति सहानुभूतिशील कृतज्ञता की भावना से वे आगे नहीं जा सके हैं । इस सीमा के बावजूद किसानों की दीन-दशा का आभास देने वाली कविता की मार्मिक पंकितयां भारतेन्दु जी के साथ-साथ उस काल के अन्य कवियों में भी पूरी संवेदनशीलता के साथ मिलती है। बालमुकुन्द गुप्त नें किसान के कष्टों का विशद वर्णन किया है-''जिनके कारण सब सुख पावें,जिनका बोया सब जन खांय,हाय-हाय उनके बालक नित भूखों के मारे चिल्लांय.......अहा ! बिवारे दु:ख के मारे निसि-दिन पच-पच मरें किसान।जब अनाज उत्पन्न होय तब सब उठवा ले जांय लगान । किसानों की दीन दशा का चित्रण भारतेन्दु युग में बद्री नारायण चौधरी 'प्रेमधन जी नें भी किया है।  उनके 'जीर्ण जनपद शीर्षक प्रबन्ध-काव्य में किसानों के अभिशप्त जीवन की करुण झांकी मिलती है -''दीन कृषक जन औरहु दया योग दरसावहीं ।जिनके तन पर स्वच्छ वस्त्र कहुं लखियत नाहीं ।मिहनत करत अधिक पर अन्न बहुत कम पावत,जे निज भुजबल हल चलाय के जगत जियावत।

 द्विवेद्वी युग देखें तो इस युग के कवियों द्वारा किसान जीवन और यथार्थ को लेकर लिखी गर्इ कविताओं में सनेही द्वारा लिखित 'दुखिया किसान ( सरस्वती ,जनवरी 1912)तथा 'आत्र्त कृषक (सरस्वती,अप्रैल 1914),मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखित'कृषक कथा(सरस्वती,जनवरी 1915)और भारतीय कृषक (सरस्वती, मर्इ 1916) किसानों की दयनीय दशा का परिचय देने के लिए लिखे गए हैं । इस युग में कृषकों के प्रति शिक्षित जनता का ध्यान आकृष्ट करने के लिए दो प्रबन्ध काव्य भी लिखे गए ।' कृषक क्रन्दन(1916 र्इ0)सनेही लिखित तथा गुप्त जी द्वारा लिखित 'किसान। दोनों ही प्रबन्ध-काव्यों के नायक किसान हैं । कृषक क्रन्दन के नायक का परिवार सूदखोर महाजन,अत्याचारी बाबा साहब और पुलिस के सिपाहियों के जुल्मों का शिकार बनता है । एक भरा-पुरा कृषक परिवार एक-एक करके नष्ट हो जाता है । भूख से तड़पकर दम तोड़ने वाला नायक मरते समय भगवान से यह प्रार्थना करता है कि' हे प्रभु ! अब इस क्रूर देश का मुंह न दिखाना....कुछ भी रचना और किन्तु मत कृषक बनाना। गुप्त जी के किसान-नायक की प्रार्थना भी कुछ इसी प्रकार की है ।

 गुप्त जी ने भारत-भारती में कृषकों की अवस्था का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि 'सौ पर पचासी जन यहां निर्वाह कृषि पर कर रहे ।पाकर करोड़ों अद्र्ध भोजन सर्द आहें भर रहे ।हा देव !क्या जीते हुए आजन्म मरना था इन्हें?भिक्षुक बनाते ,पर विधे !कर्षक न करना था इन्हें ।

 गुप्तजी के प्रसिद्ध महाकाव्य साकेत में  भी  किसान जीवन रामकथा के बहाने ही स ही मानव-सभ्यता के महत्वपूर्ण आयाम के  रूप में उपसिथति हुआ है । साकेत के अष्टम सर्ग में बनवासी राम और सीता का आजीविका के लिए कृषि-कार्य में रत होना किसान जीवन को भी एक गरिमा प्रदान करता है । अपने लगाए हुए पौधों को सींचते हुए सीता पूछती हैं किअच्छा ,ये पौधे कहो फलेंगे कब लौं ध राम उन्हें सही ढंग से कृषि की विधि बतलाते हैं-'' पौधे सींचो ही नहीं,उन्हें गोड़ो भी,डालों को चाहो जिधर,उधर मोड़ो भी, साकेत के नवम सर्ग में गुप्त जी का ध्यान किसान कर्म और जीवन से हटकर किसान मन की ओर भी गया है । पता नहीं साकेत की निम्नलिखित पंकितयों पर कभी किसी माक्र्सवादी आलोचक की दृषिट पड़ी कि नहीं  । किसान जीवन जो धरती से जुड़ा है और मानव-जाति के असितत्व और उसके आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था का भी आधार है । साकेत के निम्न गीत को उसका रूपक भी मान सकते हैं -'' मेरी ही पृथिवी का पानी, ले-लेकर यह अन्तरिक्ष सखि,आज बना है दानी !मेरी ही धरती का धूम,बना आज आली,घन धूम।गरज रहा गज-सा झुक-झूम,ढाल रहा मद मानी।मेरी ही पृथिवी का पानी । सारी अर्थव्यवस्था किसान-जीवन की रीढ़ पर टिकी हुर्इ है । अहंकार में डूबी हुर्इ । उसे ही छोटा और दीन-हीन करती हुर्इ । बादलों को देखकर कवि का किसान-मन पुकार उठता है-' व्यग्र उदग्र जगज्जननी के,अयि अग्रस्तन बरसो।....चिन्मय बनें हमारे मृण्मय पुलकांकुर वन,बरसो । साकेत की सीता समाचार के नाम पर अपने देवर लक्ष्मण से फसल के बारे में पूछ-ताछ करती हैं-' पूछी थी सुकाल-दशा मैंने आज देवर से-कैसी हुर्इ उपज कपास,,र्इख,धान की?.....पूछा यही मैंने एक ग्राम से तो कृषकों नें,अन्न,गुड़,गोरस की वृद्धि ही बखान की,। 

      छायावादी कवियों में निराला जी की कर्इ कविताओं में किसान जीवन रूपायित हुआ है । उनकी प्रसिद्ध कविता 'बादल राग की निम्नलिखित पंकितया ंतो किसानों को समर्पित हैं ही -'जीर्ण बाहु है शीर्ण शरीरतुझे बुलाता कृषक अधीरऐ विप्लव के वीर !चूस लिया है उसका सारहाड़ मात्र ही है आधारऐ जीवन के पारावार ! इसी तरह उनकी दीन कविता के केन्द्र में भी केन्द ्रीय प्रतीति किसान जीवन की ही है -'सह जाते होउत्पीड़न की क्रीड़ा सदा निरंकुश नग्नदय तुम्हारा दुर्बल होता भग्न,...कह जाते हो-यहां कभी मत आना,उत्पीड़न का राज्य दु:ख ही दु:खयहां है सदा उठाना।

उनकी विनय और उत्साह शीर्षक कविताएं किसान मन से बादलों को संबोधित हैं । वे किसान की नर्इ बहू की आंखें उसके निष्प्रभ यौवन का करुण शोक गीत ही हैं । उनकी पाचक शीर्षक कविता किसानों की दुर्दशा को समझने ंके लिए कुछ सूत्र देती है -''आदमी हमारा तभी हारा है,दूसरे के हाथ जब उतारा हैराह का लगान गैर नें दिया,यानि रास्ता हमारा बन्द कियामाल हाट में है और भाव नहीं,जैसे लड़ने को खड़े, दांव नहीं । निराला जी की अन्य कविताओं में 'लू के झोकों...'काले-काले बादल छाए.... तथा''जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ... शीर्षक कविता तो भारतीय किसान समस्या के जातीय पक्ष और स्वरूप की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है -'' आज अमीरों की हवेलीकिसानों की होगी पाठशाला,धोबी,पासी,चमार,तेलीखोलेंगे अंधेरे का ताला,एक पाठ पढ़ेंगे,टाट बिछाओ।

  हिन्दी कविता में प्रगतिवाद का स्वागत करने वाले सुमित्रानन्दन पंत की युगान्त,युगवाणी और ग्राम्या संकलन की कर्इ कविताओं में किसान जीवन उपसिथत है । जैसा कि स्वयं पंत जी  ने ही माना था कि ग्राम्या की कविताएं ग्राम्य जीवन के प्रति बौद्धिक सहानुभूति की ही कविताएं हैं-''यहां धरा का मुख कुरूप हैकुतिसत गर्हित जन का जीवन...जहां दैन्य जर्जर असंख्य जनपशु जघन्य क्षण करते यापन(ग्रामकवि शीर्षक कविता)। पन्त की ग्राम्या एक प्रगतिशील बुद्धिजीवी के पर्यटन-दृषिट से ही सही ग्राम्य जन-जीवन के बहुआयामी यथार्थ की पड़ताल तो करती ही है । पन्त का किसान वर्णन उनके भोगे हुए यथार्थ पर आधारित न होने की वजह से अथवा एक किसान जैसे आत्मीय रिश्ते की कमी से केदारनाथ अग्रवाल की किसान मन और संवेदना से लिखी गर्इ कविताओं जैसी प्रभावी और विश्वसनीय नहीं हो पातीं।

फिर भी इतना तो स्वीकार करना होगा कि महाकवि पन्त नें किसान जीवन और उसके यथार्थ को अत्यन्त सम्मान एवं सहानुभूति की भावना से देखा है ।

 छायावादोत्तर कवियों में किसान जीवन पर लिखी गयी एक मार्मिक रिपोर्ताज कविता भगवती चरण वर्मा की भैंसा गाड़ी है -' उस ओर क्षितिज के कुछ आगे,कुछ पांच कोस की दूरी पर,भू की छाती पर फोड़ों-से,हैं उठे हुए कुछ कच्चे घर ।मैं कहता हूं खडहर उसको पर वे कहते हैं उसे ग्राम।जिसमें भर देती निज धुंघलापन,असफलता की सुबह शाम।पशुबन कर नर पिस रहे जहां,नारियां जन रही हैं गुलाम।पैदा होना फिर मर जाना,यह है लोगों का एक काम ।......'चरमर चरमर-चूं-चरर-मररजा रही चली भैंसागाड़ी ! इस कविता में भैंसा गाड़ी का बिम्ब असुविधाओं और कठिनाइयों से भरे किसान-जीवन-समय के धीरे-धीरे चलनें की जो व्यंजना भेसे के रूप् में काले समय के साक्षात्कार के साथ करता है वह प्रशंसनीय है ।

 छायावादोत्तर कवियों में यदि किसी नें सजग ,सुनियोजित और पूरी वैचारिक तैयारी के साथ ं किसान जीवन और यथार्थ पर केनिद्रत कविताएं लिखी हैं तो वे प्रसिद्ध आलोचक एवं कवि डा0रामविलास शर्मा ही हैं । स्वयं रामविलास शर्मा नें तारसप्तक के दूसरे संस्करण में पुनश्च के अन्तर्गत न सिर्फ किसान यथार्थ के प्रति अपने निजी आकर्षण को व्यक्त किया है बलिक  उन कवियों की प्रशंसात्मक चर्चा भी की है जिनकी कविताओं में उपसिथत किसान जीवन से वे प्रभावित थे । उन्होंने लिखा है कि '' मेरा बचपन अवध  के गावों में बीता । उन संस्कारों के बल पर मैंने वहां के प्राकृतिक सौन्दर्य और सामाजिक जीवन पर कुछ कविताएं लिखीं । 'निराला जी के रेखाचित्रों ,स्वर्गीय बलभद्र दीक्षित'पढ़ीस की अवधी कविताओं और (खड़ी बोली में लिखी हुर्इ)कहानियों,' सुमन, ,गिरिजाकुमार  माथुर और केदारनाथ अग्रवाल की अनेक कविताओं ,पन्त की ग्राम्या ,वृन्दावनलाल वर्मा के उपन्यासों ,इधर के आंचलिक कथा-साहित्य में यह ग्राम-जीवन-सम्बन्धी प्रवृतित पल्लवित और पुषिपत होती रही है । उस परम्परा की एक कड़ी मेरी अवध-सम्बन्धी कविताएं भी हैं ।  यधपि हिन्दी कविता में सुविचारित रूप से किसान जीवन और यथार्थ का चित्रण रामविलास शर्मा के अतिरिक्त प्रमुख प्रगतिवादी कवियों केदारनाथ अग्रवाल,नागाजर्ुन और त्रिलोचन में भी मिलता है ; लेकिन अपने एकमात्र काव्य-संग्रह रूपतरंग और तारसप्तक में प्रकाशित कम कविताओं में ही अधिकांश को किसान जीवन से सम्बनिधत करके तथा अपने मित्र-कवि केदारनाथ अग्रवाल को इसी प्रवृतित के लिए लगातार प्रशंसित और प्रेरित करके हिन्दी कविता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया है ।

 रामविलास शर्मा नें अपनी कविताओं मे किसान जीवन को एक वैचारिक के साथ क्रानितकारी परिप्रेक्ष्य देने का प्रयास किया है -धरती के पुत्र की ,जोती है गहरी दो-चार बार,दस बार,बोना महातिक्त वहां बीज असन्तोष का,काटनी है नये साल फगुन में फसल जो क्रानित की ।(कार्य क्षेत्र कविता) रामविलास शर्मा की तारसप्तक की प्रकाशित कविताओं में ही चांदन ी,कतकी ,शारदीया ,सिलहार  आदि किसान यथार्थ को लेकर लिखी गर्इ वैचारिक सौन्दर्य की विशिष्ट कविताएं हैं । ये कविताएं अपने ढंग से एक बड़े अभाव की पूर्ति करती हैं । आम धारणा से अलग इन कविताओं को ध्यान से देखा जाय तो संवेदना और सांकेतिकता से भरपूर ये अंगेजी कविता का संस्कार लिए उच्चस्तरीय बिम्बधर्मी कविताएं हैं -खेतों पर ओस-भरा कुहरा,कुहरे पर भीगी चांदनी; आंखों में बादल से आंसू,हंसती है उन पर चांदनी।('चांदनी कविता) माक्र्सवादी विचारधारा के कवि नें चांदनी को अपनी कुछ टिप्पणियों और कुछ बिम्बों के माध्यम से पूंजीवादी कविता के झूठे चकाचौंध और परजीवी शोषक वैभव का प्रतीक बना दिया है -'यह चांद चुरा कर लाया है सूरज से अपनी चांदनी । चांदनी का बिम्ब कतकी कविता में भी है लेकिन इस कविता में उसका वास्तविक या प्रकृत रूप में स्वस्थ चित्रण मिलता है ।  शारदीया कविता में पकी हुर्इ फसल का प्रत्यक्षीकरण सोने के रूप में किया गया है ।  दिवा स्वप्न  कविता किसान प्रकृति और किसान जीवन के सान्दर्य को स्वप्नलोक के समानान्तर चित्रित करती है । कहना न होगा कि रामविलास शर्मा की किसान जीवन की पृष्ठभूमि पर लिखी गर्इ ये कविताएं विचार-सौन्दर्य की दृषिट से हिन्दी की उत्कृष्ट कविताएं हैं । प्रथम द्रष्टया अभिधा में लिखी गयी प्रतीत होने वाली ये कविताएं द्विवेद्वी युग या छायावादी युग की कविताओं जैसी नहीं हैं  ,उनकी तुलना निराला या पन्त की कविताओं से भी नहीं की जा सकती । इन कविताओं का काव्यबोध आधुनिक मनाविज्ञान,माक्र्सवाद तथा अंग्रेजी साहित्य के अध्ययन से विकसित दृषिट का  परिणाम हैं ।

 एक प्रतिबद्ध माक्र्सवादी कवि होने के कारण केदारनाथ अग्रवाल के काव्य में उपसिथत किसान जीवन का सामाजिक यथार्थ दृषिट के स्तर पर माक्र्सवादी विचारधारा से आच्छादित है । जनकवि केदारनाथ अग्रवाल का मन मूलत: किसान जीवन की समस्याओं एवं किसान-प्रकृति के चित्रण में रमा है । अपनी प्रसिद्ध कविताओं में तो केदारनाथ अग्रवाल नें प्रकृति का साक्षात्कार ही किसान के रूप में किया है-'एक बीते के बराबरयह हरा ठिगना चनाबांधे मुरैठा शीश पर-छोटे गुलाबी फूल का,सज कर खड़ा है।केदार की कर्इ कविताओं में व्याप्त काव्य-सौन्दर्य सिर्फ मानवीकरण अलंकार से व्यक्त नहीं हो पाता,उसे किसानीकरण अलंकार का स्वतंत्र नाम दे देना चाहिए ।  केदार जी नें किसान श्रम और कर्म को जीवन्त रूप में प्रतिबि मिबत करने वाले कर्इ गीत लिखे हैं जैसे 'कटुर्इ का गीत-'काटो काटो काटो करबी मारो मारो हंसिया.....पाटो पाटो पाटो धरतीकाटो काटो काटो करबी।

  केदार जी नें किसान संवेदना से प्रकृति का जो साक्षात्कार किया है; वह कर्इ विशिष्टताओं के कारण पन्त के बाद हिन्दी कविता का दूसरा महत्वपूर्ण प्रकृति-काव्य है । यह प्रकृति किसान के श्रम से परिवर्तित-परिवद्र्धित है । यह हम केदार की आंखों से ही देख पाते हैं कि जो प्रकृति हम देख रहे है उसका वसन्त भी किसान द्वारा बोर्इ गयी सरसों के पीले फूलों के माध्यम से व्यक्त होता है । वह किसान के पसीनें से सिंचित है ।  क्ेदार के ग्रामीण जीवन के यथार्थ-बोध मेें कर्इ स्तर,आयाम और दृषिटयां है। प्रगतिशील साहित्य की अवधारणा के अनुरूप शोषित किसान के शोषण में सहायक रीति-रिवाजों और परम्पराओं की भत्र्सना है तो किसान जीवन के प्रति आत्मीयता और सम्मान भी । सच तो यह है कि केदार जी का सारा काव्य किसान और मजदूर संवेदना का प्रतिनिधि काव्य है । किसान के बेटे की विरासत को लेकर लिखी गयी उनकी प्रसिद्ध कविता की निम्न लिखित पंकितयां निराला की भिक्षुक और तोड़ती पत्थर कविता की परम्परा को आगे बढ़ाती हैं-' जब बाप मरा तो यह पायाभूखे किसान के बेटे नें;घर का मलबा,टूटी खटियाकुछ हाथ भूमि-वह भी परती...।. (पैतृक सम्पतित कविता ) क्ेदार जी के काव्य का यथार्थ चित्रण उनकी संवेदनशीलता के कारण विशिष्ट बन पड़ा है । पन्त की तरह माक्र्सवाद उनके यहां सैद्धानितक समझ के साथ उपसिथति नहीं होता बलिक वह गहरी संवेदना के साथ उपसिथति होता है । इस दृषिट से उनकी कुछ कविताएं निराला जी की काव्य-परम्परा को आगे बढ़ाती हैं । केदार जी एक समझदार और प्रौढ़ सभ्यता-समीक्षा भी प्रस्तुत करते हैं। उनकी कविताओं में मानवीय प्रकृति का जो सूक्ष्म निरीक्षण मिलता है ; वह किसान जीवन में प्रकृति के प्रति मिलने वाली आत्मीयता और राग दीर्घकालिक साहचर्य का ही परिणाम है ।

 नागाजर्ुन की कर्इ कविताओं में किसान यथार्थ ,जीवन के महत्वपूर्ण अनुभव और स्मृति के परिदृश्य आकर्षण तथा जीवन-राग के रूप में सामने आते  है ं -याद आता मुझे अपना वह तरउनी ग्रामयाद आती लीचियां औ आमयाद आते मुझे मिथिला के रुचिर भू-भागयाद आते धान....। अकाल और उसके बाद शीषर्क कविता अकाल के सन्दर्भ में ही सही किसान जीवन  का पूरा परिदृश्य ही रच देती है -कर्इ दिनों तक चूल्हा रोया,चक्की रही उदास कर्इ दिनों तक कानी कुतिया सोर्इ उसके पास.....दाने आए घर के अन्दर कर्इ दिनों के बाद चमक उठी घर भर की आंखें कर्इ दिनों के बाद किसान जीवन से सम्बनिधत नागाजर्ुन की कर्इ कविताएं किसान-मन की कविताएं हैं । इस दृषिट से उनकी 'बहुत दिनों बाद'मेरी भी आभा है इसमें'फसल'सिके हुए दो भुटटे और सोनिया समंदर देख्ी जा सकती है ।  'बहुत दिनो बादअब की मैंने जी भर देखीपकी -सुनहली फसलों की मुस्कान-बहुत दिनों के बाद....... बहुत दिनों के बाद अब की मैंने जी भर भोगे गन्ध-रूप-रस- शब्द-स्पर्श सब साथ-साथ इस भूपर नागाजर्ुन की इन कवितओं में प्रकृति साहचर्य और साक्षात्कार का वह आत्मीय उल्लास छिपा है जो सिर्फ किसान मन में ही संभव है । फसल कविता  फसल के आदिम जादू को समझनें और समझाने का प्रयास करती है- ''फसल क्या है ? और तो कुछ नहीं है वहनदियों के पानी का जादू है वह हाथों के स्पर्श की महिमा है सिके हुए दो भुटटे की किसानी यधपि जेल के भीतर  वार्ड नंबर 10 के पीछे की क्यारियों में कैदी अखिलेश् द्वारा की गर्इ है लेकिन यह कविता किसानी के सृजन-सुख को पूरी गम्भीरता से रेखांकित करती है । सोनिया समंदर कविता गेहूं की लहराती पकी फसल के सौन्दर्य को इन शब्दों में व्यक्त करती है- बिछा है मैदान मेंसोना ही सोनासोना ही सोनासोना ही सोना । नागाजर्ुन पकी फसल के दृश्य का प्रत्यक्षीकरण लहराते हुए सोनिया समंदर के रूप में करते हैंं।

    मुकितबोध की कविता में भी श्रमरत किसानों के बिम्ब मिलते हैं। किसान मुकितबोध के लिए कठिन परिश्रम ,जीवन के आधार और संघर्ष के प्रतिनिधि नायक के रूप में हैं  । सुदूर खेतों में कठिन श्रम के बाद विश्राम और खुले आसमान के नीचे अनौपचारिक ढंग से बने भोजन की सुगन्ध कवि के कविता तक आ पहुंची है -'' रास्ते में एक ओर कण्डे की लाल आग टिक्कड़ लगी सेंकनेबहुत-बहुत परेशान थके हुए हम भी हैंलेकिन सुगन्ध उस टिक्कड़ की खूब जो किआत्मा में फैलती र्इमान की भाप बनकर...।

   तारसप्तक में प्रकाशित प्रभाकर माचवे की गेहूं की सोच  कविता गेहूं की नियति के माध्यम से किसानों की दुर्दशा और आर्थिक मजबूरियों का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करती है -''बहुत कुछ जायेगा लगानकुछ जाएगी कर्ज-किश्तबाकी रह जाएगी-झोपडि़यों की उन भूखी अतंडि़यों के लिए सूखी एक बेर रोटी-! यधपि इस कविता में कुछ जाएगी कर्ज-किश्त का कुछ खटकता है और इसके स्थान पर अधिक शब्द होना चाहिए था-लेकिन किसानों की चिन्ता तो है ही प्रशंसनीय । माचवे की ही वसन्तागम कविता खेतों में धान पक जानें से वसन्त ऋतु के आगमन का किसान जीवन में उल्लास का गीत प्रस्तुत करती है । इस कविता में भी एक औचित्य दोष है जिसकी ओर घ्यान कवि और सम्पादक अज्ञेय दोनों का ही नहीं गया है । धान पकने के बाद शीत ऋतु आती है वसन्त नहीं ,वसन्त ऋृतु तो गेहूं पकने के बाद आती है । सहानुभूति के स्तर पर ही सही ,किसान जीवन के प्रति आकर्षण और चिन्ता 1943 के आस-पास शहरी मध्य-वर्ग के बुद्धिजीवियों में भी बची हुर्इ थी ।

       भवानीप्रसाद मिश्र के लिए तो किसान धरती पर उल्लास और आनन्द के स्वर्गिक संगीत का सर्जक ही है -'और अटपठी एक तान किसी किसान कीबचे-खुचे खालीपनधरती और आसमान के मन को भरती हुर्इदुनिया क्या हुर्इ वह तो स्वर्ग हो गया ( स्वर्गिक कविता,रचनावली,भाग-3 ) अपनी किसान का गीत शीर्षक कविता में तो वे किसान को सम्बोधित ही करते हैं-'भार्इ !कुदाली चलाते चलोमिटटी को सोना बनाते चलो ।इसी तरह गांव शीर्षक कविता भी किसान-संकल्प की कविता है-''जोतना है खेत,हल के साथ निकले।बीज बोना है,दल के साथ निकले....घूल,गोबर और कचरे में भरी सीदेवियां निकली कहां जीवित मरी सी। (रचनावली-1,पृ040) मिश्र जी की 'मधुमास,यह वर्षा,'मेघ मानव,'बरसा कर ओस,'प्रकृति प्राण,'पहिला पानी तथा'वर्षारानी आदि कविताएं जहां किसान जीवन-बोध और सरोकारों से ही सम्बनिधत कविताएं हैं; वहीं 'हम जो कुछ बनते हैं,'शरीर और फसलें'कविता और फूल'बंजर हैं हम-,'पता नहीं चलता,'माटी का अनुभव'हम बोते हैं,'मंगल वर्षा,'बूंद आर्इ,'सावन,और 'सिर उठा रहे सरसों के पीले फूलशीर्षक कविताएं कहीं तो सीधे-सीधे किसान जीवन और प्रकृति का चित्रण करती हैं और कहीं किसान अनुभवों और कर्म के बिम्ब का रूपक की तरह प्रयोग करती कविताएं हैं ।

   शमशेर की कर्इ कविताओं में किसान यथार्थ का चित्रण मिलता है, यधपि उनकी अपनी ही सांकेतिक प्रस्तुति और शैली में-गाय-सानी।सन्ध्या।मुन्नी-मासी । दूध ! दूध ! चूल्हा ,आग,भूख । मांप्रेमरोटी।मृत्यु। इसी तरह कुंवर नारायण कें काव्य में किसान जीवन प्राय: स्मृति-सन्दर्भ  के रूप में बार-बार झांकता रहता है - जैसे यह धूप हरे खेतों परअनायास दो पहर जिन्दगी उड़ेलती ठण्ड से ठिठुर  रहे तलुओं को सेकतीजैसे वह नदी-नदी चली गर्इ पगडण्डी ।

    कुआनों नदी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक लम्बी और चर्चित कविता है,जिसमें नदी की स्मृतियों के साथ गांव के किसानी जीवन की स्मृतियां पूरी संवेदनशीलता के साथ कविता में उपसिथत हैं-' आदमी और चौपाएखरवा से घायल पैर की उंगलियांऔर खुर लिये लंगड़ाते चलते हैंसुअर लोटते हैं....पानी में बैठी औरतें खाना पकाती हैं ।.......एक बंजर भूमि मेंबढ़े हुए नाखून लिये मैं खड़ा हूंजैसे उनसे ही नयी फसलें उगा लूंगाजैसे उन्हीं के सहारे नहरें खींचतामैं उन खेतों में ले जाऊंगाजहां कांसे की चूडि़यां खनकतीऔरतें मुंह अंधेरे में दौरियां चलाती हैं । कविता की कुआनों नदी ग्रामीण जन और किसानों के दु:ख की महानदी बन जाती है । सर्वेश्वर की सूखा कविता भी किसान जीवन की एक गम्भीर त्रासदी से सम्बनिधत है । कवि एक साक्षी के रूप् में उसका चित्रण करता है-' अभ्यासवश ही मैं यहां हूंजलहीन कूपों की आंखों में झांकताजलती धरती के माथे परठंढे हाथ रखता।(शायद कोर्इ अंकुर उगे!)

 केदारनाथ सिंह की अनेक कविताओं में किसान जीवन से लिए गए अप्रतिम काव्य-बिम्ब देखे जा सकते हैं-'सिर्फ उसके उठे हुए सींगसिवानों में चमकते रहते हैंसूर्यास्त तक... अथवा ' सहसा बौछारों की ओट मेंदिख जाती है एक स्त्री उपले बटोरती हुर्इ..... तथा 'वह जरा सा हूंफता हैउसके कान खड़े हो जाते हैंयह भूसे की खुशबू है । केदार नाथ सिंह की बहुचर्चित लम्बी कविता बाघ के कर्इ अंश किसान जीवन से भी सन्दर्भित हैं ।

 नयी कविता के अंक 5-6 में प्रकाशित शरद देवड़ा की 'बैरिन रात:अभागिन नारी  कविता की अभागिन नारी एक किसान की स्त्री ही है, जो रसोंर्इ के घुटते घुएं में रोटियां सेकती है,चक्की पीसने से कड़ी हो आर्इ अपनी हथेलियों से अपने कानों को ढकती है । इसी अंक में प्रकाशित प्रभाकर मिश्र की अलाव की आंच में शीर्षक कविता में भी किसान जीवन की चर्या उपसिथत है तो जितेन्द्रनाथ पाठक की शरद घन शीर्षक कविता में भी किसान जीवन बिमिबत हुआ है! क्विता फसल के पक जाने पर बिना जरूरत के बरसने जा रहे बादलों को सम्बोधित है और उनसे न बरसने की प्रार्थना करती है -' ओ शरद के अयाचित घन!मत मुड़ो इस गांवविलसने दो पीत सरसों की हुलसती छातियों पर धूपरंभने दोगाय,बछड़े,भैंस,बैलों भरी चरनी को निकल जाने दो नदी के वक्ष से उठती हुर्इ भाप...।

 तीसरा सप्तक में प्रकाशित विजयदेवनारायण साही  की रात में गांव कविता किसान अनुभव का ही बिम्बांकन है -' सो रहा है गांव।खेतियों की अनगिनत मेड़ेंकि धरती के दुलारे वक्ष कोउंगलियों से पकड़बच्चों की सलोनी नींद में सुकुमारसो रहा है गांव! कीर्ति चौधरी की फूल झर गये तथा लता-1,2,3 शीर्षक से लिखी गयी कविताएं भी किसानी अनुभव की कविताएं हैं । किसान अनुभवों को अपनी काव्य-भाषा में पिरोने के लिए सोमदत्त की कविताएं भी याद रखी जाएंगी-'अपनी मिटटी को जगाना थापुरखों के कोठार से बीज निकालकरउम्मीद का बिरवा लगाना था । (पुरखों के कोठार से कविता )

कुछ वर्ष पहले अब्दुल बिसिमल्लाह के दोहों का संकलन 'किसके हाथ गुलेल शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।

उसमें भी किसान जीवन के यथार्थ पर टिप्पणी करते अनेक दोहे थे । यह संकलन दोहा छन्द को खड़ी बोली में पुन:प्राप्त करने की दृषिठ से भी महत्वपूर्ण था -'' किसकी माटी किसकी खेती,किसका है खलिहानदाना ले जाय बनिया साराफांके घूल किसान ।

     नक्सलबाड़ी आन्दोलन से प्रेरणा लेकर हिन्दी कविता में सक्रिय और स्थापित कवियों ज्ञानेन्द्रपति, अरुण कमल और आलोक धन्वा में से ज्ञानेन्द्रपति और अरुण कमल दोनों के यहां किसान यथार्थ की कविताएं मिल जाती हैं । ज्ञानेन्द्रपति के यहां किसान अनुभवों के अप्रत्यक्ष काव्यात्मक उपयोग और प्रत्यक्ष किसान-यथार्थ के बोध वाली दोनों प्रकार की अच्छी कविताएं बड़ी संख्या में मिल जाती हैं । पहली कोटि के उदाहरणस्वरूप उनके संशयात्मा संकलन की पहली ही कविता देखी जा सकती है-'' इस बीच जिससड़क परतुम नहीं चले होसमय का बूढ़ा बैल चला हैछोड़ता खुरों के बराबर गडे......नित नर्इ जिसके हल की फालखींचती सड़कों की रेख । इसी तरह ज्ञानेन्द्रपति की एक अन्य कविता' मिट गए मैदानों वाला गांवकिसान जीवन के लिए महत्वपूर्ण, चरागाहों के मिटनें के माध्यम से गांवों का शोक-चित्र ही प्रस्तुत करती है । इसी तरह एक आदिवासी गांव से गुजरती सड़क कविता भी सभ्यता के उस शोषण-चक्र को समनें और समझाने का प्रयास करती है ,जो गांव तक जाती भी है तो लूटने की नीयत से ही । ज्ञानेन्द्रपति की खेवली तक सड़क नहीं आती कविता भी शहर केनिद्रत सभ्यता द्वारा किसान जीवन के शोषण-चक्र का अनावरण करती है-'' सड़क हो चाहे नहींखिंचे आते हैं मुंह बन्द बोरों से भरे अनाजजैसे दुधगर बाल्टेऔर कामगार लोग.........खेवली! जिसकी माटी मेंउपजते हैंकवि और किसानकि भारत के प्राण जहां बसते हैं ! इसी तरह ज्ञानेन्द्रपति की उड़ती हैं पतितयां शीर्षक कविता भी

शहरों की ओर पलायन करने वाले किसानों के बच्चों के विस्थापन का अत्यन्त प्रभावशाली रूपक प्रस्तुत करती है-''पतितयां नहींराजधानी पहुंचती हैंमधुकूपक रसाल और रसगुल्लक लीचियांæकों-टोकरियों में और पहुंचते हैं कोमल कुम्हलाए बालकनौकरी की तलाश में।

 अरुण कमल की भी कर्इ कविताएं काव्य शिल्प की तलाश में किसान जीवन और यथार्थ के आस-पास जाती हैं । अनाज के बिम्ब तो उनकी प्रसिद्ध कविता धार में भी है और गरीबी की त्रासदी को विडम्बना की सीमा तक चित्रित करती उधर के चोर शीर्षक कविता में भी ।  किसान यथार्थ से सम्बनिधत प्रत्यक्ष संवेदना वाली जीवन्त कविताएं भी उनके यहां हैं-'कभी-कभी बथान में गौएं करवट बदलती हैंबैल जोर से छोड़ते हैं सांसअचानक दीवार पर मलकी टार्च की रोशनी कोर्इ निकला है शायद खेत घूमने।(जीवधारा कविता ) ऋतुराज की एक कविता अपने घायल बैल के लिए किसान के दु:ख और संवेदनशीलता को इस रूप में व्यक्त करती है-' हल कुछ ज्यादा बड़ा था,मुझे तो चोट नहीं लगीलेकिन बैल के घाव हो गया है ।उदभ्रान्त की कविता हांड़ी कालाहांड़ी की किसान त्रासदी से सम्बनिधत है-

'मजे से पक रहा हैएक किनकी चावल काएक विराट हांड़ी मेंभूख के सुलगते चूल्हे परखदबदखदबद। ।

  नवगीतकारों में शम्भूनाथ सिंह के यहां किसान प्रकृति के बिम्ब हैं तो गुलाब सिंह के 'धूल भरे पांवसंकलन के गीतों में किसान जीवन के विविध चित्र हैं । उन्होंने किसानों के व्यकितवाचक संज्ञाओं का प्रयोग करते हुए किसान जीवन के जीवन्त बिम्ब सृजित किए हैं । महत्वपूर्ण नवगीतकार उमाशेकर तिवारी का'खेतों में आंसू बोते हैं शीर्षक गीत भी किसान यथार्थ और संवेदना की मार्मिक प्रस्तुति करता है -' वे लोग जो कांधे हल ढोतेखेतों में आंसू बोते हैं-उनका ही हक है फसलों परअब भी माने तोबेहतर है। प्राय: गांव गया था गांव से लौटा जैसी चर्चित पंकितयों के लिए जाने जाने वाले गीतकार कैलाश गौतम की रामदुलारे कविता एक किसान की आर्थिक सिथति और मनोदशा का अच्छा चित्रण करती है-'भूखे-प्यासे टूटे-हारेखेत से लौटे रामदुलारेबनिया कहता ब्याज चाहिएसौ का पत्ता आज चाहिएजहां देखिए आग लगी हैदिन भर भागम-भाग लगी है...। आधुनिक दृषिट-सम्पन्न एक नए गीतकार ओम धीरज की 'खूंटे पर बंधे हुए शीर्षक कविता  किसानों की यथासिथतिवादी नियति और जड़ता को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है ।

  समकालीन युवा कवियों में दिनेश कुशवाह की  'उस मां की कोख से जनमें बिना  कविता में भी गरीब किसान स्त्री का दर्द ही व्यक्त हुआ है-' जितना सहती है गरीब की बेटीक्या सहेगी धरती ! इसी प्रकार दिनेश की एक अन्य कविता भी किसान कर्म के प्रति सम्मान और कृतज्ञता भाव ज्ञापित करती है-''मुंह में कौर डालें तो सोचेंउस खेत के बारे मेंजहां से आता है अनाज। नए कवियों में केशव शरण की एक हलवाहे का हल चलाना देखकर कविता भी उल्लेखनीय है ।

 श्रीप्रकाश शुक्ल की अनेक कविताएं भी किसान जीवन से लिए लुप्तप्राय शब्दों और स्मृतियों का बिम्बात्मक  संरक्षण करती हैं । हड़परौली उनकी ऐसी ही कविता है , जिसमें वर्षा न होने की सिथति में सित्रयों द्वारा अंघेरी रात में इन्द्र को रिझाने के लिए नग्न होकर सामूहिक रूप से हल चलाने की प्रथा को आधार बनाया गया है । श्रीप्रकाश की अधिकांश ऐसी कविताएं एक भाषाविद रीझ की उपज हैं । किसी पुरातातिवक भाषाविद की तरह उनकी चिन्ता किसान जीवन से सम्बनिधत लुप्तप्राय शब्दों को बचा लेने की है । किसान जीवन के पर्याय के रूप में पिछड़ते गांव का चित्र उनकी अपना गांव कविता इसप्रकार प्रस्तुत करती है- 'बादलों की आवाजाही के बीचपगुरी करताअपनी ही पीठ के भार से द्रवित अपना यह गांवशहर के ठीक सामनेंलयनहा बरधा की तरहताकता रहता है ।

  इधर प्रकाशित रामाज्ञा शशिधर के 'बुरे समय में नींद संकलन की एक कविता विदर्भ विदर्भ के किसानों की त्रासदी को गम्भीर सांकेतिकता के साथ प्रस्तुत करती है । कपास की खेती करनें वाले किसानों के शोषण और आत्महत्याओं की त्रासदी तथा उनके यथार्थ की भयावहता को रामाज्ञा नें अपनी विदर्भ कविता में जिसप्रकार रूपाान्तरित किया है वह उनकी रचना-सामथ्र्य का तो मानक है ही ,एक नए समर्थ कवि की प्रापित के रूप में हिन्दी कविता के लिए भी महत्वपूर्ण है - संसार का सबसे बड़ा श्मशानधूसर सलेटी कालासंसार का सबसे बड़ा कफनमुलायम     सफेद आरामदेहमणिकर्णिकेतुमनें विदर्भ नहीं देखा है  कविता विदर्भ के सफेद कपास की खेती को कफन की संज्ञा देकर और मणिकर्णिका से सन्दर्भित कर शोषण के कारण हो रही मौतों के बारे में सीधे-सीधे न कहते हुए भी बहुत कुछ कह देती है ।      निलय उपाध्याय की कुछ कविताएं भूमण्डलीकरण के दौर के किसानों की सिथति को प्रामाणिक रूप् में रेखांकित करती है । जैसे लड़कियों को आवारा लम्पट पुरुषों का घूरना चुभता है; जैसे कोर्इ कसार्इ किसी स्वस्थ गाय के मांस के मूल्य को ललचयी दृषिट से आंकता है ,कुछ वैसा ही अहसास निलय  उपाध्याय  की मोटांजा कविता के नायक किसान मनबोध बाबू का भी है-' मनबोधबाबूमहीनों हो गए खेत घूमते-घूमतेघर-घर पूछते और महसूस करतेउनके खेत घिर गए हैंसिक्कों और स्वार्थ से।युवतर पीढ़ी के कवि राकेश रंजन की कविता चेत भर्इ चेत किसानी से पलायन की समस्या की ओर गम्भीर चेतावनी के स्वर में घ्यान आकर्षित करती है-' कल था जो हरा-भरालहराता खेतआज हुआ बंजरकल होगा वह रेतचेत भर्इ चेत ।

     इधर हिन्दी की एक लोकप्रिय और अधिक सम्प्रेषणीय विधा के रूप हिन्दी गजल नें भी सभी का ध्यान आकर्षित किया है । गजल की संवादी ,संवेदी और गेय प्रकृति उसे किसान यथार्थ की अभिव्यकित के लिए भी अधिक प्रभावी और उपयुक्त विधा बनाती है । जिन गजलकारों नें किसानों की पीड़ा को अपनी गजलों के माध्यम से व्यक्त करने के लिए अधिक ख्याति अर्जित की है ,उनमें बल्ली सिंह चीमा,अदम गोंडवी और कमल किशोर श्रमिक विशेष उल्लेखनीय हैं । कुछ अच्छे प्रयोग दुष्यन्त के यहां भी मिलते हैं - तेरे गहनों सी खनखनाती थीबाजरे की फसल रही होगी । किसान यथार्थ के लिए बल्ली सिंह चीमा की निम्न पंकितयों को देखा जा सकता है-''खेत प्यासे रह गए धान हुए बीमारटा-टा करके उड़ गयी सावन में बरसात (जमीन से उठती आवाज,पृ066) तथा '' सांड़ खेतों में चरता हो जैसे कोर्इयूं हमारे घरों में अंधेरा फिरे । (तय करो किस ओर हो) जैसी पंकितयां किसान जीवन के अनुभपों से कविता को गूंथकर ही बनार्इ गयी हैं । अदम गोंडवी की गजलें तो किसान यथार्थ को सम्प्रेषित करने के लिए कला का रंचमात्र भी झीना परदा नहीं रहने देती  । उनकी गजलों को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे वास्तविक जीवन ही गजल के रूप में उतार दिया गया हो -' बूढ़ा बरगद साक्षी है,किस तरह से खो गर्इरमसुधी की झोपड़ी सरपंच की चौपाल मेंखेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गएहमको पटटे की सनद मिलती भी है तो ताल में ।

    आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं किसान और उसके पर्यावरण को या तो सरकार बचा सकती है या फिर बाजार । विडम्बना यह है कि जो राजनीति उसे बचा सकती है ,वही पूंजीपतियों से मिलकर उसके विरुद्ध साजिश रचाही है ।  बाजार किसान की तभी सहायता कर सकता है जब वह किसान के उत्पादों को मंहगा करके बेचे ,जबकि सरकार उसे अपने स्वार्थ के कारण ऐसा करने नहीं देती । जनता को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने के प्रयास में मारा और हार जाता है किसान ही क्योंकि सरकार विदेश से गेहूं मंगाकर दाम गिराने के लिए अपने यहां के बाजारों में बेच देती है। इस तरह किसान के हर उत्पाद बाजार में सरकार के बन्धक हैं । क्षतिपूर्ति के लिए सरकार चाहे तो ऐसा भी कर सकती है कि वह किसानों का पंजीकरण करे और उन्हें मुआवजा के रूप मेेेेेेेेेेंं कुछ क्षतिपूर्ति राशि या वेतन नियमित रूप से दे । किसानों के लिए शीघ्र ही कुछ निर्णायक रूप् में किया जाना चाहिए । चाहे सरकार उनके यहां से मंहगा खरीद कर अनाज को सस्ते मूल्य पर ही क्यों न बेचे  । करे कोर्इ भी ,कुछ भी लेकिन शीघ्र ! किसानों को वास्तविक जीवन और कविता दोनों में ही बचाने और संरक्षण देने की जरूरत है ।


सम्पर्क-    रामप्रकाश कुशवाहा
          बी-1,श्री सांर्इ अपार्टमेण्ट,
          करौंदी (टंडि़या)सुन्दरपुर,वाराणसी(उ0प्र0)पिन-221005
           मोबाइल-09451342730

शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

स्त्री-आत्मकथाएं : विमर्श के वृत्त एवं परिधि

संवेद  54  जुलार्इ 2012
सम्पादक-किशन कालजयी
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आज के समाजशास्त्रीय आलोचना के दौर में आत्मकथा की विधा आलोचकों और पाठको दोनों के लिए ही महत्वपूर्ण हो गयी है । र्इमानदारी से लिखी गर्इ आत्मकथाएं सामाजिक व्यवहार के अनेक ऐसे तथ्य और ब्यौरे उपलब्ध कराती हैं ,जिनका अध्ययन साहित्य के साथ-साथ समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के लिए भी किया जा सकता है । आत्मकथा लेखक या लेखिका से यधपि तटस्थ आत्मविश्लेषण की अतिरिक्त योग्यता के साथ अपने जीवन में घटी घटनाओं और आए व्यकितयों को पक्षपातरहित ढंग से व्यक्त करने की अपेक्षा की जाती है ,लेकिन जैसाकि मानवीय स्वभाव की दुर्बलता है कि वह अपने पक्ष को तो संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है ,दूसरों के पक्ष को नहीं । दूसरों का पक्ष प्राय: अनुमान के लिए छोड़ दिया जाता है । अधिकांश आत्मकथाओं में स्वाभाविक है कि यह दूसरा पक्ष पुरुष-पक्ष ही होगा । स्त्री के अविवाहित जीवन-काल में यह प्राय: भार्इ या पिता के रूप में पहरेदार की भूमिका निभाता पाया जाता है और विवाह के बाद पति के रूप में ।
      हिन्दी की अधिकांश स्त्री आत्मकथाएं कथाकारों द्वरा ही लिखी गयी हैं । इसलिए शिल्प की दृषिट से इन आत्मकथाओं में उपन्यास की विधा का कथात्मक शिल्प देखा जा सकता है । चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की 'पिंजरे की मैना,मन्नू भंडारी की एक कहानी यह भी , प्रभा खेतान की 'छिन्नमस्ता और मैत्रेयी पुष्पा की -कस्तूरी कुण्डल बसै और गुडि़या भीतर गुडि़या -सभी औपन्यासिक शिल्प वाली आत्मकथाएं ही हैं । संभवत: इसीलिए इन सभी आत्मकथाओं में पठनीयता की दृषिट से अदभुुत आकर्षण है । अनुभव-जगत की भिन्नता तथा सीमित जीवन-अवसरों को गहरार्इ कहें या फिर लम्बे समय तक जीने की बाध्यता या विवशता उनके लेखन में निरीक्षण की ऐसी सूक्ष्मता का निवेश करती है ,जिसकी कल्पना भारतीय पुरुष साहित्यकारों केलेखन में तो नहीं ही की जा सकती । इन आत्मकथाओं से स्त्री-मन की वह दुनिया सामनें आती है,जिसे बहिमर्ुखी और सामाजिक होने के कारण पुरुष-मन प्राय: सोच और देख ही नहीं पाता । उनके आत्मकथाओं की यह दुनिया जीवन के छोटे-छोटे संवेदनात्मक प्रसंगों ,विवरणों,वृत्तान्तों और प्राय: उपेक्षणीय समझे जाने वाले मानवीय सम्बन्धों और रिश्तों की भावपूर्ण दुनिया है । बाहरी संसार से बचता और बचाता,कर्इ-कर्इ दृश्य-अदृश्य मोचोर्ं पर एक साथ जूझता ,घरेलू वास्तविकताओं और समस्याओं का एक अलग प्रबन्धन इतिहास लिए-जो पारिवारिक और वैयकितक होते हुए भी समाज को सही समय पर सही ढंग से कुछ महत्वपूर्ण प्रदान करनें की सृजनात्मक क्षमता भी रखता है ।
       भारतीय सामाजिक यथार्थ को देखते हुए हिन्दी की आत्मकथाओं की नायिकाओं यानि लेखिकाओं को सामाजिक(परम्परागत) दाम्पत्य वाली महिलाओं और असामाजिक(स्वैचिछक या क्रानितकारी) दाम्पत्य वाली महिलाओं में बांटा जा सकता है । दोनो ही प्रकार के दाम्पत्य में पुरुष-सत्ता और प्रकृति का भिन्न रूप उभरता है । दोनों में से कौन सही है या गलत यह प्रश्न बेमतलब है । महत्वपूर्ण यह है कि दोनों में ही मानव-जीवन में लैंगिक व्यवहार के भिन्न प्रारूप और रिश्ते सामने आते हैं । अपरम्परागत ,क्रानितकारी अथवा असामाजिक दाम्पत्य में मन्नू भण्डारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी तथा प्रभा खेतान की आत्मकथा छिन्नमस्ता को रखा जा सकता है । यहां यह भी बता देना उचित होगा कि बंगाल में छिन्नमस्ता देवी का एक प्रसिद्ध मनिदर भी है । प्रभा खेतान को शीर्षक रखने की प्रेरणा इसी देवी के नाम से ही मिली होगी ,लेकिन पूरी आत्मकथा को पढ़ने के बाद मेरे पाठक मन के एकान्त में जो प्रभाव-जन्य भाष्य उभरा था वह परम्परा से अलग हटकर (यौन-)मस्ता नायिका का था । परम्परा से अलग हटकर यौन-व्यवहार का सहचर चुनने की जिद मन्नू भण्डारी और प्रभा खेतान दोनों में ही है । इस पथ के चुनाव में कहीं न कहीं जुनूनी आदर्शवाद मन्नू भण्डारी में रहा ही होगा ,ळयोंकि वे एक स्वतंत्रता सेनानी की बेटी रही हैं । सीमोन द बउआर जैसी जीवन की आकांक्षा वाली प्रभा खेतान नें अपना स्वदेशी सात्र्र एक गैर-विचारक विवाहित डाक्टर के रूप में ढूंढ़ निकाला और अपने उस महाप्रयोग की गाथा छिन्नमस्ता के रूप में हिन्दी जगत को दी । इन दोनों महिलाओं की आत्मकथा को मैं विवाह की अनिच्छुक महिलाओं की दाम्पत्य-त्रासदी के रूप में देखता हूं । इन दोनों विदुषी महिलाओं नें संभवत: रचनात्मक स्वतंत्रता की खोज में परम्परागत शतोर्ं में परम्परागत पुरुष की अधीनता स्वीकार नहीं की । दोनों ही एक सीमा तक बार्इ-पास दाम्पत्य को ही जीती रहीं । चन्द्रकिरण सौनरिक्सा की आत्मकथा पिंजरे की मैना तथा मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा गुडि़या भीतर गुडि़या परम्परागत दाम्पत्य का स्त्री-विमर्श तथा पुरुष-पुराण प्रस्तुत करती हैं ।        हिन्दी की स्त्री-आत्मकथाओं को पढ़ते हुए एक बार फिर इस बात की पुषिट हो जाती है कि भारत में जाति व्यवस्था की सामाजिक अभियानित्रकी में मुख्य आधार प्रतिबनिधत स्त्री जीवन ही रहा है । अविवाहित जीवन-पर्यन्त तक उसका मुख्य कर्तव्य भावी पति ,परिवार और जाति के सम्मान के लिए अपने कौमार्य ,चारित्रिक शुद्धता और पवित्रता की रक्षा करना है । विवाह के बाद भी उसके संयम में पति की सामाजिक प्रतिष्ठा जुड़ाी है । 
         अब तक सामने आयी हिन्दी की महिला आत्मकथाओं में पुरुष-बन्धन के प्रति विद्रोह और प्रतिशोध का अचेतन परिणाम वह पर-पुरुषगामिता का आयाम नहीं जुड़ पाया है ,जो समाज में प्राय: देखने-सुनने को मिलता है । बहुत-सी कुलटा और छिनाल मानी जानी वाली सित्रयों की पृष्ठभूमि का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करें तो कुछ रोचक सच्चाइयां सामनें आती हैं। सिर्फ यौन शुचिता ही नहीं बलिक सच्चार्इ ,र्इमानदारी, वफादारी आदि अनेक नैतिक-मूल्यों का विकास पूंजीवादी सभ्यता नें सम्पतित के उत्तराधिकार की समस्या से निपटनें के लिए ही किया है । पुरुष अपने श्रम से अर्जित सम्पतित को अपने वास्तविक जैविक उत्तराधिकारी  को ही सौंपना चाहता था । इसीलिए यौन-संयमी एवं सच्चरित्र सित्रयों का महिमामंडन बढ़ता गया और भारत में सती-प्रथा तक जा पहुंचा । यह दूसरी बात है कि एक पौराणिक चरित्र की स्मृति में विकसित सती और जौहर-प्रथा भारतीय शासक-वर्ग की सित्रयों में ही मध्ययुग में प्रचलित रही । पुरुष-प्रधान कबीलार्इ युग के सांस्कृतिक स्मृति-अवशेषों के कारण स्त्री का दर्जा पुरुष की सम्पतित का ही रहा । प्राचीन काल से ही स्त्री लूटी और कमार्इ जा सकती थी । जाति-निर्धारण में यधपि स्त्री की कोर्इ भूमिका नहीं थी ,लेकिन किसी पुरुष की निजी सम्पतित होनें के कारण उस पुरुष के मान-मर्दन के लिए परार्इ सित्रयों पर यौन-निष्ठा से विचलित करने वाले हमले जारी रहे । इस तरह सित्रयां मर्दानगी की दृषिट से जीत-हार का भी माध्यम रही हैं । नियनित्रत करने की सबसे आम प्रविधि डांट और भय ही रही है। विवाह पुरुष को अधिकार देता रहा है स्त्री पर शासन के लिए; लेकिन ऐसा तभी हुआ है जब सित्रयों को बाल्य-काल से ही शासित होनें का संस्कार भी मिला हो ।
      इस दृषिट यानि मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के लिए मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा गुडि़या भीतर गुडि़या दिलचस्प तथ्य उपलब्ध कराती है । डाक्टर पति पुरुष-वर्चस्व की परम्परागत भूमिका में है ,इस बात से अनभिज्ञ कि जो विवाह उसनें किया है ,वह बचपन से ही पिता से वंचित युवती से है । पुरुष-नियन्त्रण से पूरी तरह मुक्त एक स्वाधीन स्त्री-प्रधान परिवार । मैत्रेयी को माता-पिता द्वारा पुरुष-प्रधान समाज के पति-पत्नी के रिश्ते की कोर्इ स्मृति ही नहीं है । पति अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण उसी रिश्ते को पाना और जीना चाहता है । लेखिका इस पति को समझनें के लिए मनोवैज्ञानक रूप से अयोग्य है । फलत: असुरक्षा का शिकार पति उसे नियन्त्रण में बनाए रखने के लिए हाफता और थकता रहता है । पूरी आत्मकथा में मैत्रेयी के लिए पति और दाम्पत्य एक दमनकारी कुणिठत कर देने वाली सत्ता की पराधीनता के रूप में सामने आता है । उनका अचेतन विद्रोह और प्रतिशोध की उस सीमा तक पहुंचते-पहुंचते ठिठक कर रह जाता है ,जहां सित्रयां प्रेम और मुकित के नाम पर अपने तानाशाह पति से बदला लेने के लिए दूसरे पुरुष की बाहों में समा जाती हैं । अपनी ही देह को दूसरों को सौंप कर कि मैं इसकी सम्पतित दूसरे पुरुष को सौंपकर उसे वंचित कर रही हूं । मैत्रेयी पुष्पा की प्रसिद्ध कहानी 'गोमा हंसती है के चरित्रों और कथावस्तु में तो नहीं बलिक लेखकीय दृषिट की पृष्ठभूमि में यह आक्रोश और प्रतिशोध का अचेतन झांकता हुआ देखा जा सकता है । इसतरह कुछ महिला साहित्यकारों की आत्मकथाएं असामान्य मनोविज्ञान की विश्लेषण सीमा में आने के कारण इस दृषिट-विशेष से भी महत्वपूर्ण हैं ।
          हिन्दी की स्त्री आत्मकथाओं में चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा 'पिंजरे की मैना कथावस्तु के बहुस्तरीय एवं बहुकालिक यथार्थ के कारण जीवन के विविध रंगों को अपने में समेटे हुए है । जिन विशेषताओं के कारण बेबी हालदार की 'आलो-आंधारि सराही जाती है ,उनमें सहज मासूम और र्इमानदार अभिव्यकित वाला गुण चन्द्रकिरण के यहां भी है । वह करुणा भी जो पुरुष-प्रधान समाज की ज्यादतियों को चुपचाप स्वीकार करते जाने के कारण पाठक के भीतर क्षोभ उत्पन्न करती जाती है -चन्द्रकिरण की आत्मकथा को एक अन्तहीन अनुत्तरित संभावना और संवेदनात्मक विस्तार देती है । इस सच के बावजूद कि उनके यहां बेबी हालदार वाला निम्नवर्गीय यथार्थ अवश्य नहीं है ,लेकिन एक अन्तहीन आर्थिक तंगी और उससे जूझते हुए जीतते रहना इस कृति को भारतीय मध्यवर्गीय जीवन की महाकाव्यात्मक एवं औपन्यासिक स्त्री-आत्मकथा में बदल देता है । चन्द्रकिरण सौनरिक्सा की आत्मकथा के वृत्त की परिधि मन्नू भंडारी और मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाओं की परिधि से विस्तृत है । उसमें जीवन के त्रासद परिसिथतियों की मार तो है ही ,आधुनिकता का प्रभाव ,जाति का अतिक्रमण, पारिवारिक कुलीनता की सृषिट तथा आर्थिक वर्ग बदलने के साथ-साथ नारी की प्रसिथति में अन्तर सभी कुछ एक साथ देखने को मिलता है । चन्द्रकिरण की आत्मकथा झांसी के पतन और उसमें किए गए अंग्रेजों के कत्लेआम से शुरू होती है । उनके प्रपितामह अं्रग्रज सैनिकों की लूट-मार में मार दिए जाते हैं । भयभीत महिलाएं बच्चों को लेकर पलायन कर जाती हैं । यहां तक कि अपने-अपने पति के मरनें की पुषिट भी नहीं कर पातीं । एक शरणार्थी बच्चे की जिजीविषा और संघर्ष को पूरे कथात्मक वृत्तान्त के साथ प्रस्तुत करती चन्द्रकिरण सौनरिक्सा की यह आत्मकथा , अप्रत्याशित घटनाशीलता की दृषिट से सबसे रोचक और पठनीय आत्मकथा है-कम से कम इसका पूर्वाद्र्ध ।
       इसप्रकार चन्द्रकिरण सौनरेक्सा के वैयकितक जीवन को केन्द्र में रखकर लिखी गयी 'पिंजरे की मैना की परिधि समाज और इतिहास के चरम छोर को भी छूती चलती है । आत्मकथा को वंशावली के बहानें 1857 के विद्रोह में झांसी के पतन के बाद अंग्रज सेना द्वारा की गयी बर्बर लूट में मारे गए पड़बाबा के वृत्तान्त से आरम्भ करने के कारण उनकी यह आत्मकथा एक पारिवारिक एवं आत्मकथात्मक उपन्यास की रोचकता तो लिए हुए है ही ,इसमें महाकाव्यात्मक विस्तार ,संवेदनात्मक द्वन्द्व एवं गहरार्इ क अनेक अवसर एवं प्रसंग भी हैं । पात्रों का जीवन आर्थिक और सामाजिक विभीषिका में बार-बार दिशाहीन होता है,ठहरता है ,नर्इ संभावनाओं की तलाश करता है और सहानुभूति में डूबा हुआ पाठक का मन भी । मात्र सात और नौ वर्ष के दो बालक और आठ वर्ष की एक बालिका लिए जनसंहार में अपने-अपने पति के शव को लावारिस छोड़कर भागते शरणर्थी समूह के साथ अपनी जान बचाकर भागी दो विधवा सित्रयों की नियति और निर्णय के भविष्य में जन्म लेने वाली लेखिका का अतीत छिपा हुआ था । अपने मूल जन्मस्थान की दिशा (राजस्थान का नारनौल) छोड़कर आजीविका के लिए लाहौर पहुंचा परिवार आर्थिक सुरक्षा तो पा लेता है लेकिन अपने जातीय समाज की सुरक्षा खो बैठता है ।
       चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा अज्ञात नियति की ओर बढ़ रहे एक प्रवासी और शरणार्थी परिवार के र्इमानदार संघर्ष की ,मध्यवर्गीय जीवन की महागाथा है । आत्मकथा विप्लव में मारे गए बनिया के आठ वर्षीय बेटे गणेशीलाल के आर्थिक सुरक्षा के लिए र्इमानदार जीवन-संघर्ष और उनके लाहौर के प्रतिषिठत जमीदार परिवार बन जाने की विजयिनी जीवनगाथा से होती हुर्इ अनेक पारिवारिक उत्थान-पतन के सोपानों से गुजरती अंग्रेजी सेना में स्टोरकीपर पिता रामफल तक पहुंचती है । पिता रामफल की पहली विवाहिता ,जो जाति से ब्राहमणी थीं और उनकी मृत्यु के बाद दूसरी विवाहिता जो जाति से यादव-कन्या थीं और लेखिका चन्द्रकिरण की मां भी । इस आत्मकथा का भावी घटना-क्रम अपनी विशेष शरणार्थी या प्रवासी पृष्ठभूमि के कारण अन्तर्जातीय विवाहों की नियति की ओर मुड़ता जाता है । ऐसे सारे पात्र जो रूढि़वादी परम्पराओं की दृषिट से सामाजिक मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं ,ऐसे ही निर्णयों द्वारा अपने अभिशप्त जीवन से मुकित का रास्ता खोजते हैं । कोर्इ भयानक गरीबी और दहेजप्रथा से मुकित के लिए तो कोर्इ बालविधवा हो जाने के अभिशाप से मुकित के लिए ।  आर्थिक दबाव या फिर आर्थिक सुरक्षा का आकर्षण विवाह के लिए जाति-बन्धन को शिथिल करते हैं । सिर्फ कुछ बेहतर घट जाने की संभावनाओं की आस्था के भरोसे यह आत्मकथा और उसके पात्र जीवन की अगली यात्रा जारी रखते हैं तो पुरुष के आधार पर जाति का निर्धारण करनें की परम्परा उन्हें फिर अपनी जाति में समाहित भी कर लेती है । स्वयं वैश्य परिवार की लेखिका का विवाह भी कायस्थ-पति कानितचन्द्र सौनरेक्सा से हुआ । आत्मकथा का यह पक्ष 'पिंजरे की मैना आत्मकथा को समाजशास्त्रीय अध्ययन की दृषिट से भी महत्वपूर्ण बना देता है । लेखिका के कथाकार बनने के पीछे उसकी पढ़ाकू-वृतित के साथ-साथ वंश की समृद्ध एवं अप्रत्याशित स्मृतियां भी निर्णायक भूमिका में हैं ।
         अपनी गौरवपूर्ण किन्तु असामान्य विशेष पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण ही एक निष्पक्ष एवं क्रानितकारी लेखकीय विवके तथा सामाजिक अन्तदर्ृषिट चन्द्रकिरण सौनरेक्सा केलेखन की विशेषता है । जाति-निरपेक्षता की पारिवारिक स्मृतियां ,आजीविका के लिए बि्रटिश नौकरशाही का जीवन-स्तर, लड़के-लड़कियों को समान रूप से शिक्षा प्रदान करने पर बल तथा सुधारवादी आर्यसमाजी संस्कार लेखिका के चेतन-अचेतन प्रारमिभक व्यकितत्व-निर्माण की दृषिट से अत्यन्त महत्वपूर्ण है । चन्द्रकिरण सौनरेक्सा की यह पृष्ठभूमि ही उनकी आत्मकथा को दूसरी अन्य स्त्री आत्मकथाओं से अलग और विशिष्ट करती है । यधपि एक आम भारतीय मध्यवर्गीय स्त्री से अलग होनें का लेखकीय दावा वे कहीं नहीं करतीं । उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि वैसे भी अगर कोर्इ मेरी जीवन-यात्रा को समेटना चाहे तो वह घर-नौकरी-घर के चक्र में ही समाप्त हो जाएगी -क्योंकि तीन-तीन लड़कियों को घ्यान के साथ-साथ बड़ी गृहस्ती ,पूरे संयुक्त परिवार की बड़ी बहू का उत्तरदायित्व निभाने का बीड़ा उठाये चलाना बच्चों का खेल नहीं था ।(पिंजरे की मैना,पृ0380) उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ''आत्मकथा को यदि प्रतिदिन का रोजनामचा बना लिया जाये तो उसके विस्तार का कोर्इ अन्त नहीं रहेगा और मैंने विस्तार को किसी साहितियक-कृति की महानता का मानदण्ड नहीं माना । हमेशा की तरह बिना किसी लाग-लपेट के ,सीधी-सच्ची ,दिल से निकली बात को दिल तक पहुंचाने की कोशिश की है । बस इतना-सा अंतर मेरी कृतियों और इस आत्मकथा में है  किवे जगबीते थीं और यह आपबीतीं हैं ।(पिंजरे की मैना,पृ0 415)'आत्मकथा का केवल एक उददेश्य होता है अपनी जीवन-यात्रा का ,निष्पक्ष दर्शक की तरह पुनरावलोकन करना । 'पिंजरे की मैना उसी का फल है ।(वही,पृ0 415)
      पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वाह और कर्तव्य भावना से भरी चन्द्रकिरण की आत्मकथा जीवन की उथल-पुथल ,राग-द्वेष और यश-अपयश से रची-बुनी है । उसमें अपने बेवफा पति के लिए भी ममत्व एवं करुणा है । उससे यह बात भी उभर कर आती है कि परिवार जीवन की एक अपरिहार्य मूलभूत संस्था है ,वह अपने सदस्यों के असितत्व के लिए प्रेम के साथ या फिर प्रेम के बिना भी समर्पण एवं निष्ठा की मांग करती है । पिंजरे की मैना की तरह ही परिवार को बचाने के पक्ष में दाम्पत्य सम्बन्धों में स्वैचिछक यातना के वरण के प्रसंग मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा 'गुडि़या भीतर गुडि़या तथा मन्नू भंडारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी को भी महत्वपूर्ण बनाते हैं ।
         मेरी सीमा यह है कि मैं यौन-आसकित की मानसिकता जीने वाले लेखन का एक अच्छा और र्इमानदार पाठक कभी नहीं रहा हूं । यधपि यौन-हारमोनों से आच्छादित मन-मसितष्क आयु-विशेष की एक अपरिहार्य सच्चार्इ है । पुरुष-मन तो अपनी देह-प्रकृति के कारण देर तक लम्पट बना रहता है लेकिन स्त्री-शरीर के समयबद्ध कार्यक्रम के कारण एक आयु के बाद दुष्चरित्र सित्रयां भी शान्त और शालीन लगनें लगती हैं । एक और तथ्य का साझाा करना उचित होगा कि पाठयक्रम में समिमलित मैत्रेयी पुष्पा की प्रसिद्ध कहानी 'गोमा हंसती है को मैं ठीक से पढ़-पढ़ा नहीं पाया । वे एक ऐसे परिवार और परिवेश से आयी हैं ,जो कि्रयाओं ,वर्जनाओं ,चर्चाओं और मानसिकता में पूरी तरह यौनिकताजीवी ही रहा है । पता नहीं यह कृष्ण का प्रभाव है या मुगल सभ्यता के केन्प्द्र आगरे के समीपवर्ती होने का या कि डकैतों के उत्पादन के लिए मशहूर बुन्देलखण्ड का कि मैत्रेयी पुष्पा के स्मृतियों वाले गावों मेंं ग्रामीण समाज में पायी जानें वाली वह धार्मिकता कम दिखती है जो कर्इ अ्रचलों में ग्रामीण परिवेश को सेक्स और अपराध से विरत रखती है । मैत्रेयी का लेखन सूक्ष्म निरीक्षण शकित, आंचलिक मौलिकता और गहरी संवेदनात्मकता के साथ साहसिक होनें के कारण निश्चय ही ध्यान आकर्षित करता है लेकिन यह भी सच है कि रुचि के स्तर पर जब तक उनका मन भर नहीं जाता या फिर उनकी यौन-स्मृतियों का खजाना खत्म नहीं हो जाता ; तब तक उनका एक-एक शब्द यौन-अतृपित और सेक्स हारमोन से लिथड़ा-लिथड़ा लगता है । यौनजीवी रुचि और मानसिकता के कारण कुछ-कुछ ऐसी ही अनुभूति मुझे काशीनाथ सिंह की भी कुछ कहानियां पढ़कर होती है । (यह लिखते हुए मैं हिन्दी आलोचना में किसी लेखक की रुचि के प्रश्न को भी मूल्यांकित करने की प्रस्तावना कर रहा हूं । यथार्थ और शोषण के चिन्तन के नाम पर यौनिकताजीवी चित्रण राहुल सांकृत्यायन से लेकर स्त्री विमर्शवादी कुछ महिला साहित्यकारों तक भी देखे जा सकते हैं । साहित्य-लेखन एक सचेतन क्रिया है । दुर्घटनात्मक,अवांछित और आपराधिक स्मृति का सच के नाम पर भारी मात्रा में निवेश यदि भावी समाज की चिन्ता से मुक्त रहकर किया जा रहा हो तो ऐसे लेखन को साहितियक अपराध मानकर उसका आलोचनात्मक प्रतिरोध करना ही होगा । ) उनकी 'महुआचरित कहानी पढ़ते समय भी कुछ-कुछ वैसा-वैसा ही महसूस करता रहा । यधपि इसमें सन्देह नहीं कि महुआचरित एक बहुत ही अच्छी कहानी है । उच्च्स्तरीय अभिव्यकित-क्षमता के बावजूद मैत्रेयी का काफी लेखन मुझे यौनजीवी मानसिकता के उत्पाद लगते हैं । उनका लेखन यौन-सरोकारों और चिन्तन से बाहर निकल ही नहीं पाता । 
       मैत्रेयी पुष्पा के स्त्री-विमर्श में घुसनें से पहले मैं अपनी समझदारी के एक अन्तरंग पक्ष को साझाा करना चाहूंगा । पहली यह कि आपराधिक जीन स्त्री और पुरुष दोनों को समान रूप से मिलते हैं । हां ,स्त्री के अपराध करने का तरीका भिन्न हो सकता है ,लेकिन मानव-जाति में गुण्डा-गुण्डी दोनों ही समान रूप् से जन्म लेते हैं । पुरुषों की तरह कर्इ प्रेम-शिकारी वृतित वाली महिलाओं को भी देखा है । अपने दवंग व्यकितत्व के कारण ऐसी महिलाएं पहले अपने पिता या पति को हठपूर्वक जीतती और पराजित करती हैं और फिर दूसरों या पूरे समाज को जीतने या पराजित करने निकल पड़ती हैं । फिर तो वे एक व्यसन के रूप में पुरुषों को जीतने के लिए निकल पड़ती हैं ,ऐसे ही कुछ पुरुष भी दूसरों के वैवाहिक जीवन को दूषित कर चारित्रिक आक्रामकता में ही अपनी मर्दानगी का प्रमाणपत्र बटोरते रहते हैं । यह असितत्व की सार्थकता,स्वीकृति और उसके परीक्षण का मामला है । एक प्रतिस्पद्र्धी और हिंसक मन अगल-बगल तांक-झांक करता रहता है । कुछ लोगों का परिवार बिखरता है ,कुछ टूटते-फूटते हैं , कुछ शराब पीने लगते हैं और कुछ आत्महत्या कर लेते हैं । जैसे पुरुष स्त्री जीवन और मर्म को नहीं समझ पाता ,वैसे ही स्त्री पुरुष-मन के उस अन्तद्र्वन्द्व को कहां समझ पाती है । कुछ दिनों पूर्व एम्स में ही कार्यरत एक सुन्दर महिला डाक्टर केाक्टर पति नें आत्महत्या कर ली थी । स्वाभाविक है कि सुन्दर पत्नी अपनी सुन्दरता की सामाजिक -सार्वजनिक प्रतिष्ठा भी चाहेगी । सहकर्मी देवरों में उसके मन को जीतने की होड़ लग गयी होगी । समीप की ऐसी उपसिथतियां एवरेस्ट शिखर बन जाती हैं । अगर पति सामाजिक रूप् से अधिक सज्जन हुआ या अपने मित्रों से उसके रिश्ते अधिक अन्तरंग और जटिल हुए कि वह खुल कर मित्रों को मना न कर सके तो वह पत्नी से ही अपेक्षा करेगा कि यह कार्य वही कर दे । मैं देखता हूं कि मैत्रेयी से भी उसके पति नें ऐसी ही अपेक्षा की होगी । इसीलिए बच गए । अन्यथा एम्स के ही इस दूसरे केस में कम संवेदनशील डाक्टर पत्नी के कारण उसके डाक्टर पति ने ंतो आत्महत्या ही कर ली थी ।
     स्त्री-विमर्श वाले दौर में प्राय: यह देखता हूं कि सांस्कृतिक-सामाजिक या फिर कानूनी रूप् से स्थापित मान्यता-प्राप्त अधिकारों के प्रति जब विद्रोह शुरू होता है तो सारे हमले उस पति-पुरुष पर होने लगते हैं ,जो उन मूल्यों का प्रतिनिधि और प्रतीक मात्र ही होता है । मैत्रेयी की आत्मकथा पढ़ते समय मैं बार-बार ऐसा सोचता रहा कि मुकाबला बराबरी का नहीं चल रहा है । लेखिका पत्नी का पक्ष तो पाठक के सामनें है ,लेकिन जैसे वास्तविक जीवन में मैत्रेयी पत्नी के रूप में समाज से छिपी रहीं, एम्स के डाक्टर पति की गुमनाम पत्नी की तरह ही पाठकों के लिए उनके डाक्टर पति का पक्ष भी अनुपसिथत है । यहां वे भी एक गुमनाम आम पति हैं । जब मैत्रेयी अपने पति के मित्र डा0 सिद्धार्थ के साथ अन्तरंग समर्पण प्रदर्शित करने चाला नृत्य कर रही थीं तो हो सकतेा है कि यह किसी भाभी का अपने कुंवारे धर्म-देवर के प्रति करुणा ही रही हो । क्योंकि आत्मकथा यह नहीं बताती कि डा0सिद्धार्थ को पत्नी भी थी या नहीं । अपनी पत्नी को परपुरुष के साथ उत्तेजक नृत्य करते देख सामाजिक और मानसिक दृषिट से यह पाठकीय जिज्ञासा भी उठती है कि  इसी समय मैत्रेयी के पति भी सिद्धार्थ की पत्नी के साथ नृत्य कर लेते तो स्वस्थ हो जाते । जीवन और आत्मकथा में ऐसे मोड़ आने पर ही यह स्पष्ट हो पाता कि धर्म-देवर डा0 सिद्धार्थ उस सीमा तक खुलकर मित्र की पत्नी के साथ जा पाते या नहीं या फिर अपने मित्र की पत्नी के साथ अपने डाक्टर पति को भी नाचते देखकर स्वयं भावी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को कैसा लगता ? इसतर इस आत्मकथा रूपी तराजू में सिर्फ एक ही पलड़ा है जिस पर स्वयं लेखिका बैठी हुर्इ है । पति वाले पलड़े की रस्सी ही टूटी हुर्इ है और वह परिदृश्य से पूरी तरह गायब या अनुपसिथत है ।
     मैत्रेयी को भी पढ़ते समय पाठक-मन को सबसे अधिक असुविधा वहां होगी जहां एक पक्ष तो संयम और निष्ठा प्रदर्शित कर रहा है और उसके आधार पर वैसा ही संयम और निष्ठा अपने वैवाहिक साझेदार से भी मांगता है । पत्नी के प्रति अपने समर्पण और संयम के कारण ही मैत्रेयी के पति किसी स्त्री-विमर्श के काल्पनिक पुरुष-पात्र की तरह पुरुष-उत्पीड़न के आदर्श प्रतीक नहीं बन पाते , न ही उन पर कोर्इ गम्भीर आरोप ही बनते दीखता है । उनका पति एक ऐसा मासूम अपराधी डाक्टर पति है जो एम्स में व्यस्त नौकरी करता हुआ ,मरीजों की दुनिया में अपनी आजीविका के लिए खोया सिर्फ इतने से ही आश्वस्त है कि वह अपनी पत्नी और बेटियों के लिए ही नौकरी कर रहा है । संभवत: अपने इसी समर्पण के कारण ही मैत्रेयी अपनी मां जैसी जिन्दगी जीने का सपना छोड़ देती हैं । वे विद्रोह नहीं कर पातीं । लेकिन उनके पास कुछ ऐसा अतिरिक्त प्रतिभा के रूप में है , जिसे बेटियां जिनमें उनका अपना भी जीन है ,जान और पहचान लेती हैं लेकिन उनके पति नहीं जान पाते । वे उनकी प्रतिभा पर एक बड़े अभिभावक पत्थर की तरह पड़े रहते हैं । इस दृषिट से मैत्रेयी का अंकुरण बहुत मार्मिक है । उनकी आत्मकथा के माध्यम से सित्रयों के उपेक्षित मानसिक संसार का ऐसा लोक सामनें आता है ,जो उनके पति की ही भांति पुरुष-प्रधान व्यवस्था में पला-बढ़ा भारतीय पुरुष शायद ही सोच पाए । मेरा सुझाव तो यह भी है कि मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा गुडि़या भीतर गुडि़या को भारतीय पतियों के लिए एक अनिवार्य पायपुस्तक घोषित कर देना चाहिए और हो सके तो नव-विवाहित पतियों को उपहार स्वरूप् भेट देनी चाहिए । कहीं ऐसा न हो कि जिसे वे एक पत्नी वस्तु के रूप में जीने जा रहे हों , उसमें कोर्इ मैत्रेयी छुपी बैठी हो और जिसकी प्रतिभा से समाज वंचित रह जाए । समाज के लिए तो हम गौतम बुद्ध द्वारा यशोधरा को ,राम द्वारा सीता को, सुभाषचन्द्र बोस द्वारा अपनी पत्नी को छोड़ा जाना बर्दाश्त कर लेते हैं और उन्हें क्षमा कर देते है। महादेवी वर्मा का भी साहित्य-सृजन के लिए शिशु-सृजन से विरत रहना अलग से पाठकीय श्रद्धा की मांग करता है । फिर मैत्रेयी जैसी प्रतिभा के लिए ,यधपि उन्होंने महावीर स्वामी की तरह लम्बी प्रतीक्षा क बाद ,परिवार के दायित्वों से मुक्त होकर ही लेखन में कदम बढ़ाया ,काफी प्रशंसनीय है और उनके संघर्ष के प्रति सम्मान का भाव जगाता है ।
        मैत्रेयी की आत्मकथा पाठकों के सामनें भी यह प्रश्न रखती है कि उनके पति उनके भीतर के कुछ को क्यों नहीं पहचान पाए ! जो अनुमान मैं लगा पाता हूं वह यह कि वे मैत्रेयी से विवाह कर उपकृत करने के भाव और अहंकार को जीते रहे होंगे । एक पिता-विहीन ग्रामीण क्षेत्र की कन्या से विवाह ,वह भी बिना दहेज लिए ,सिर्फ उच्चशिक्षित होने के कारण ,यहां तक कि सौन्दर्य के धन से भी वंचित ,जिसकी हीनता ग्रनिथ को लेखिका भी बार-बार अनेक अवसरों पर व्यक्त करती है-एक सीमा तक उनके पति की प्रगतिशील छवि भी सामनें लाती है । उन्होंने अपने ढंग से मैत्रेयी पुष्पा को समय से पहले पहचाना ,भले ही अपनी पत्नी बनाने के लिए ही सही-इस चुनाव के लिए ही सही मैं मैत्रेयी पुष्पा से असहमत होते हुए ,मर्दवादी पक्षधरता के आरोप के खतरे के बावजूद उनके पति का प्रशंसक होना चाहूंगा । हां,मैं उनको एक तानाशाह दुनियादार तंग-दिल पति अभिभावक भी अवश्य कहना चाहूंगा । मैत्रेयी के प्र्रति एक सतर्क प्रेमी पति का रूप वहां दिखता है जहां वे दिल-दुर्बल मित्रों और पत्नी को चारित्रिक स्खलन की भावी दुर्घटना से बचानें के लिए चुपचाप हास्टल छोड़कर किराए का मकान तलाशने निकल पड़ते हैं । एक ऐसी पत्नी ,जिसकी मां सार्वजनिक सेवा में होने के कारण भांति-भांति के पुरुषों से पेशे की आवश्यकता के कारण सहज रूप से मिलती हो । मैत्रेयी की अबोधता भी समझ में आती है और यह भी कि पति के सहकर्मी सामाजिक देवर डा0 सिद्धार्थ के प्रति ही सही ,उनके विवाहेतर आकर्षण का उनके व्यकितत्व निर्माण में अत्यन्त महत्व रहा होगा । यह एक अचेतन विद्रोह के रूप में भी हुआ होगा । उनसे विवाह कर पति ने जो एहसान किया था ,उस घमण्ड को चुनौती देकर उसे सुरक्षात्मक मोड में ला देना फिर संयमित जीवन जीकर स्वयं अपने पति पर एहसान लाद देना कि 'देखो! मैं नहीं भागी न ? मैत्रेयी के इस विवाहेतर प्रभाव-प्रसंग ने उन्हें उस हीनता ग्रनिथ से भी मुकित दी होगी जो सजने-संवरने वाली सित्रयों से कम आकर्षक होने के बोध के रूप् में उनके व्यकितत्व को कुणिठत कर रही थी । यह उनके दाम्पत्य के लिए काफी सन्तुलनकारी रहा होगा । अन्तत: प्रेम किसी के असितत्व और व्यकितत्व के महत्व की अन्तरंग स्वीकृति ही तो है ।  अपने इस मनोवैज्ञानिक नजरिए के कारण मैत्रेयी पुष्पा और उनके पति से एक साथ सहमत होने के कारण संभव है कि मेरा विश्लेषण प्रचलित-प्रायोजित नारीवाद के अधिक समीप न हो , लेकिन मानवीय चरित्र की र्इमानदार विशेषज्ञता वाला अवश्य होगा ।  
           स्त्री-मुकित और विमर्श की दृषिट से मैत्रेयी की पूर्ववर्ती आत्मकथा'कस्तूरी कुण्डल बसै समाजशास्त्रीय विश्लेषण की दृषिट से भी अधिक महत्वपूर्ण है । उसमें भारतीय सामाजिक विकास की ऐतिहासिता भी सुरक्षित है । यह वह दौर है तब शिक्षित होने की कीमत अनेक सित्रयों को अविवाहित रहकर ही चुकानी पड़ी है । अपनी बेटियों को शिक्षित देखने वाले अभिभावक एक क्रानितकारी जोखिम से गुजरते थे । मैत्रेयी की मां कस्तूरी भी इसी जोखिम से जूझती रहती है । प्रतिबनिधत ,सशर्त या सीमित स्वतंत्रता ही भारतीय समाज आधुनिकता के बावजूद सित्रयों को दे पाया है । इसका बहुत कुछ श्रेय रामकथा के साथ-साथ मुसिलम समाज का भी है । पाश्र्व-प्रभाव के स्तर पर अन्य सम्प्रदायों की सित्रयां भी व्यकितत्व और अर्थ की स्वतंत्रता के बावजूद एक सीमा से अधिक छवि की स्तंत्रता को नहीं जी पातीं ।
         यह अजीब है कि आधुनिकता और माक्र्सवाद के प्रभाव से भारत में सबसे पहले जाति-विमर्श और स्त्री-विमर्श के व्यापक परिप्रेक्ष्य में ही दलित-विमर्श भी आना चाहिए था । कारण कि तीनों उतनें असम्बद्ध नहीं हैं जितनें प्रतीत होते हैं । भारत में सम्पतित से अधिक जाति संस्था की सुरक्षा के लिए ही स्त्री को प्रतिबनिधत किया गया है । पुराणों में उन्मुक्त सित्रयों के अनेक चरित्र मिलते हैं । सती ,पार्वती ,रूकिमणी, गंगा और आम्रपाली आदि अनेक चरित्र प्राचीन प्रेम विवाहों की स्मृतियां संजोए हैं । लेकिन बाद में जैसे-जैसे जाति-प्रथा जड़ जमाती गयी स्त्री-बन्धन वाले शास्त्र भी बढ़ते गए । जाति की शुद्धता और स्त्री की पवित्रता दोनों ही अवधारणाएं एक-दूसरे की पूरक और पर्याय बन गर्इं । संभवत: यही कारण है कि मैत्रेयी पुष्पा और दोहरा अभिशाप की दलित आत्मकथा लेखिका कौशल्या बैसंत्री की पीड़ा में कोर्इ विशेष अन्तर दिखार्इ नहीं देता । दोनों के ही आशय और निष्कर्ष की मनोभूमि प्राय: समान है- ''पुरुष-प्रधान समाज औरतों का खुलापन बरदाश्त नहीं करता । पति तो इस ताक में रहता है कि पत्नी पर अपने पक्ष को उजागर करनें के लिए चरित्रहीनता का ठप्पा लगा दे । पुत्र,भार्इ,पति सब मुझ पर नाराज हो सकते हैं ,परन्तु मुझे भी तो स्वतंत्रता चाहिए कि मैं अपनी बात समाज के सामनें रख सकूं । मेरे जैसे अनुभव और भी महिलाओं को हुए होंगे , परन्तु वे समाज और परिवार के भय से अपने अनुभव समाज के सामनें उजागर करनें से डरती और जीवन भर घुटन में जीती हैं । समाज केी आंखें खोलनें के लिए ऐसे अनुभव सामनें आनें की जरूरत है ।(दोहरा अभिशाप ,परमेश्वरी प्रकाशन,दिल्ली,1999,पृष्ठ 7)
         परम्परागत सामाजिक यथार्थ के रूप में देखें तो आर्थिक दबाव में परिवार चलाने के लिए महिला-श्रम की आवश्यकता के कारण दलित जातियों में पुरुष-नियन्त्रण प्राय: ढीला-ढाला ही रहा है । वे खेत में साथ-साथ काम करते और दूकान चलाते देखी जा सकती थीं । आजीविका के लिए पति पर अधिक निर्भर नहीं रहनें के कारण कर्इ बार कर्इ-कर्इ पति बदल लेती थीं । कुछ-कुछ वैसा ही जैसा आज कल आधुनिका योरोपीय सित्रयां करती दिखार्इ पड़ती हैं । उच्चशिक्षित और उच्च-पदस्थ होनें पर कौशल्या बैसंत्री के पति देवेन्द्रकुमार नें प्रसिथति परिवर्तन के बाद उच्च-वर्ण में मिलनें वाले पतित्व को जीना चाहा होगा ,जबकि कौशल्या बैसंत्री के संस्कार और स्मृति इसके विपरीत थी । यहां देखा जाए तो मैत्रेयी को जो स्वतंत्रता पितृविहीन होने के कारण स्वाभाविक रूप से मिल गयी थी ,कौशल्या बैसंत्री नें उसे दलित जाति में जन्म लेने के कारण सहज रूप में ही एक स्मृति और संस्कार के रूप में प्राप्त किया था । पुरुष-प्रधान समाज के अनुभव होने ंके कारण ही भारतीय स्त्री का यह यथार्थ आम लगता है जो कि तेलगु दलित नारीवादी कवयित्री शशि निर्मला नें अपनी कविता में की है-'कहते हैं कोर्इ मुझे बना कर पीढ़ाखींच-खींचकर बैठेगेंडालकर नकेलमुझे हाकेगे-नचाएंगे(आधुनिकता के आर्इनें में दलित,सं0अभय कुमार दुबे,पृ0240 पर उदधृत)। इस तरह विमर्श के केन्द्र में जाति-सत्ता और पुरुष-सत्ता का वर्चस्व ही है। पुरुष-तंत्र की असली चिन्ता यह है कि स्त्री स्वतंत्र होगी तो सिर्फ पुरुष की अधीनता को ही अस्वीकार नहीं करेगी बलिक जाति की अधीनता को भी अस्वीकार करेगी ।
     विमर्श को उत्तेजित करने की क्षमता के आधार पर देखें तो मन्नू भंडारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी अधिक शिष्ट,संयमित और शालीनता से लिखी जाने के कारण कम उपयोगी है । फिर भी वह नर्इ कहानी युग के साहितियक परिवेश की ऐतिहासिक स्मृति को संरक्षित करने के कारण ,राजेन्द्र यादव ,मोहन ,राकेश ,कमलेश्वर और स्वयं मन्नू भंडारी के जीवन और संस्मरण को संरक्षित करने के कारण महत्वपूर्ण 
है ।  मन्नू भंडारी की आत्मकथा 'एक कहानी यह भी नर्इ कहानी आन्दोलन के दौर के अति-महात्वाकांछी साहितियक परिवेश के साथ-सााथ मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव के समस्यात्मक दाम्पत्य के बीच मीता की त्रयी के माध्यम से सृजनात्मक महत्व के कर्इ खुलासे भी करती है । तनाव में ही सही मन्नू जी नें अपनी कर्इ खदानों के नाम-पते उजागर कर दिए हैं ,जहां की संवेदना रूपी पत्थरों से उन महान कृतियों की रचना हुर्इ है । यदि समय के साथ सारे प्रकरण खुलकर सामनें आते नही ंतो पता भी नहीं चलता कि मन्नू भंडारी अपने रचना-स्रोतों को छिपाने की कला में कितनी माहिर हैं । उनकी कहानी 'यही सच है को पढ़े और उनकी आत्मकथा को भी तो पता चलता है कि उस कहानी की नायिका तो उनकी आत्मकथा के नायक राजेन्द्र यादव ही हैं । सिर्फ लिंग और नाम का परिवर्तन किया गया है । इसी तरह उनकी बेटी को कलकत्ता भेजनें के प्रसंग से 'आपका बण्टी का सम्बन्ध देखा जा सकता है ।
    आत्मकथा में रेखांकित उनके समस्यात्मक दाम्पत्य जीवन को विश्लेषित करें तो मनोवैज्ञानिक तथा चारित्रिक दृषिट से प्रेम में माता और मीता को पानें का द्वन्द्व भी लगता है । मन्नू जी में राजेन्द्र यादव के प्रति करुणा ,वात्सल्य और मातृत्व भाव ज्यादा दिखता है । हंस में अपनी प्रसिद्धि का लक्ष्य पा लेने के पूर्व तक राजेन्द्र यादव की महत्वाकांक्षा के लिए मन्नू जी साहितियक प्रसिद्धि का सर्वोच्च लक्ष्य-शिखर रही हैं । राजेन्द्र यादव का यह प्रेम संरक्षण और सुरक्षा को तलाशने वाला प्रेम है । विवाह के पूर्व मन्नू जी राजेन्द्र यादव को बार-बार आश्चस्त भी करती रहती हैं । जाहिर है कि प्रसिद्धि के शिखर के स्तर पर मीता उनकी बराबरी नहीं कर सकती थी । मन्नू जी अपनी जीवन-कथा में इस बात के लिए सन्तोष कर सकती हैं कि राजेन्द्र यादव का पुरुष अहं कर्इ बार अपना वियर्जन करके उनके आगे-पीछे दुम हिलाता हुआ समर्पित हुआ । लेकिन अलग रहकर भी यदि क्षमा-भाव को ही जीना था तो बेहतर होता कि राजेन्द्र यादव के साथ ही रहतीं । उनकी आत्मकथा को पढंकर ऐसा प्रतीत होता है कि दुर्घटना में विकलांग हो चुके राजेन्द्र यादव के लिए मन्नू भंडारी हमेशा वैसाखी की भूमिका में ही रही हैं । इन दिनों राजेन्द्र यादव की चल रही है और वे हंस के सहारे दौड़ ही नहीं रहे हैं बलिक उड़ रहे हैं लेकिन मन्नू भंडारी की वात्सल्यमयी प्रकृति को देखें तो यदि आज राजेन्द्र जी किसी प्रकार लडखड़ानें लगें तो वे तुरन्त सारे गिले-शिकवे भूलकर राजेन्द्र यादव के पास पहुंच जाएगीं । ऐसा मुझे लग रहा है । क्यों लग रहा है ,इसका कारण यह है कि बड़ी और संवेदनशील प्रतिभाएं प्राय: अकेली होनें के लिए अभिशप्त होती हैं और सिर्फ अपने अह ंके कवच में ही स्वस्थ रह पाती है। मुझे यह भी लगता है कि अभी के अलगाव का निर्णय मन्नू भण्डारी के साहितियक स्वाभिमान के विज्ञापन की आवश्यकता से भी उपजा है । यह भी कि अपने विचित्र वात्सल्यमयी प्रेम के कारण ही वे राजेन्द्र यादव को कुण्ठाओं से मुक्त जीवन जीनें देने के लिए या यह कहें कि खुलकर चरनें देनें के लिए उनके रास्ते से हट गयी हैं । इसके बावजूद मुझमें मन्नूजी के विवेक में ही भरोसा है । राजेन्द्र यादव ,मन्नू भंडारी और रहस्यमयी मीता का त्रिक प्रेम-सम्बन्ध कुछ अधिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की मांग करता है । मुझे उनकी मीता की जाति का पता नहीं है लेकिन यदि वे भी राजेन्द्र यादव जी की जाति से नहीं हैं तो जाति से बाहर प्रेम और सेक्स-सम्बन्ध ढूढ़ने ंके लिए उनका प्रगतिशील और क्रानितकारी प्रेमियों के रूप में अभिनन्दन किया जा सकता है । मन्नू भंडारी नें जब राजेन्द्र यादव के प्रणय-निवेदन के बाद उनसे विवाह का निर्णय लिया था तो वे कं्रानितकारी पिता से प्रेरित एक क्रानितकारी विवाह के निर्णय की आत्ममुग्धता को भी जी रही थीं । उच्चशिक्षित होने के कारण वे सहारा बन सकती थीं, दे सकती थीं ,सहारा लेना उनके स्वाभिमान की प्रकृति में नहीं हैं । अपनी आत्मकथा में भी वे एक शालीन महिला की तरह ही सामनें आती हैं । यदि वे आत्मनिरीक्षण करें तो एक असामान्य ग्रनिथ की सम्भावना उनमें हो सकती है । उनके चेतन और अचेतन मन के लिए जैसे परावलमिबत राजेन्द्र ही अधिक सुविधाजनक रहा है । यदि ऐसा है तो राजेन्द्र यादव एक अप्रकट अहंकार का दंश अवश्य झेलते रहे होंगे । एक बड़प्पन का प्रभामण्डल जिेसे वे अतिक्रानन्त नहीं कर पाये । समवत: इसीलिए राजेन्द्र यादव के सम्पूर्ण आत्मविश्वास एवं व्यकितत्व की मुकित के क्षण मन्नू भंडारी से अलगाव में ही घटित होते हैं । क्योंकि वे भी मनुष्य हैं इसलिए उनमें भी र्इष्र्या की गुंजाइश के रूप में देखा जा सकता है । इस सच के बावजूद मुझे साफ-साफ दिखता है कि अपने दाम्पत्य-जीवन की अधिकांश .त्रासदियों के लिए वे लगभग नहीं जिम्मेदार हैं । उन्होंने तो पूरे जोश में एक महान निर्णय के रूप में असुविधाओं से घिरे राजेन्द्र यादव से शादी की थी । फिर इस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कौन है ? राजेन्द्र यादव ? आत्मकथा बताती है कि त्रासदी मीता के विवाह से इन्कार कर देने और प्रेम पत्रों को वापस भेज देने से ही शुरू होती है । मीता की एक रहस्यमय आक्रामक प्रेम शैली । देखना यह है कि हमारा भी प्रिय साहितियक नायक फुटपाथ पर है । समय में सुन्दरता के मापदण्ड से प्रथम कोटि की पाठिकाएं-पें्रमिकाएं मोहन राकेश को गयी होंगी । क्योंकि वह समय उनकी ही प्रमुखता का था । हमारा नायक भविष्य का नायक है-कुछ-कुछ नेहरू के बाद के लालबहादुर शास्त्री जैसा । प्रेम के लिए भटकता नायक मीता तक प्रणय-निवेदन के साथ पहुंचता है। दो वरिष्ठ नायकों मोहन राकेश और कमलेश्वर की प्रतिस्पद्र्धा में मन्नू भंडारी का स्वावलम्बन से अर्जित यश और उनकी प्रापित ही हमारे साहितियक नायक को हीनता ग्रनिथ से उबार सकता था । संकोची व्यकितत्व के कारण आत्मकथा की नायिका अनारम्भी रही होगीं और प्रेम में पहल न करने वाली होने से संभवत: राजेन्द्र यादव को भी पहले विश्वास नहीं रहा होगा कि मन्नू एक दिन पूरे विश्वास के साथ उनसे विवाह का निर्णय कर लेंगी । इस असमंजस में नायक अपने प्रेम का वैकलिपक तलाश जारी रखता है । शायद मीता नें जब अपने मानवद्र्धन के लिए उनके प्रेम-पत्र लौटाए थे तो उसे लगा होगा कि मन्नू जी उसके अखाड़े में नहीं उतरेंगी । मन्नू जी की स्वीकृति की सूचना मात्र से तिरस्कृत नायक उसे अतिमहत्वपूर्ण लगने लगता है । वह पेम के अखाड.े में पुनर्वापसी का असफल प्रयास करती है । समय से जूझते नायक की लाटरी निकल चुकी है । वह एक ऐसा सहयात्री व्यकितत्व पा चुका है जिसकी उसे उम्मीद नहीं थीं । उसे छोड़नें का तो सवाल ही नहीं उठता जी ! 
           अब भी एक रहस्य बचा हुआ है कि त्रासदी कहां से शुरू होती है । मेरी दृषिट में रहस्यमयी मीता का आत्महन्ता देवदासी प्रेम ही वह प्रमुख कारक है जो हमारे साहितियक नायक को भीतर से विचलित करता रहता है । किसी के नाम पर विवाह न करना और बिना विवाह के रह जाना भी प्रतिशोध और सजा का एक आत्महन्ता तरीका है । हमारा नायक भीतरघाते खाता रहता है । सिर्फ पिता के रूप में ही उनकी आत्मकथा का नायक कुछ सामाजिक मर्यादाओं का पालन करता दीखता है । पूरी आत्मकथा अपनी पत्नी की शालीनता से आश्वस्त पति का चारित्रिक विचलन लगती है । इस तरह मन्नू भंडारी की आत्मकथा एक साहितियक नायक की छवि को खलनायक के छवि में रूपान्तरित करती है ।ं
      भारतीय समाज में स्.त्री होना ही असुरक्षित होना है । सिर्फ स्त्री होने के कारण ही आपकी हत्या हो सकती है । जन्म लेने से पहले भी और जन्म लेने के बाद भी । पर्स में एक भी रुपए न हों लेकिन राह चलते स्त्री होने के कारण ही अपहरण हो सकता है । हालात ऐसे हैं कि पालतू या घरेलू ही क्यों न हो कभी भी कोइ पुरुष रूपी कुत्ता पागल हो सकता है । सिर्फ सिथतियां अपराध कारित करने के अनुकूल सृजित होनी चाहिए । हमारे समाज की यह ऐसी भयावह सच्चार्इ है कि हम सब मनोरोगी हो गए हैं । समाचार पत्रों में जिस तरह की घटनाएं प्रकाशित होती हैं और कुछ न छपते हुए भी जिस तरह अगल-बगल के परिवेश से उभर कर कानों तक पहुंचती है । वह कर्इ बार अविश्वसनीय होते हुए भी सच होता है । ऐसा नहीं है कि यथार्थ का यह परिदृश्य इधर ही दो चार वषोर्ं में उभरा है ।
        आज से पचास -पचपन वर्ष पहले भी जब आजादी के आठ-दस वर्ष हुए होंगे ,मुझे याद है मां को एक नाविक घरानें की ग्रामीण स्त्री नें एक ऐसी बात बतार्इ थी ,जो आज भी मेरे मसितष्क में अनुत्तरित प्रश्न की तरह कौंधता रहता है । उन दिनों यातायात के साधन बसें आदि कम थीं । नदियों पर पुल नहीं थे । तैरनें वाले पीपे के पुलों के लिए ठीकेदार वसूली करते थे और नदियों में पानी बढ़ने पर सहसा ही पुल ढूढ जाते थे या फिर तोड़ देने पड़ते थे । वाराणसी में उच्च शिक्षा में अध्ययनरत युवती रही होगी । बस विलम्ब से आयी या उसनें पुल पार न कर पाने की सिथति में नदी के पार ही सवारियों को उतार दिया । नदी के दूसरी ओर वाली बस नहीं मिली होगी और प्रतीक्षा में अंधेरा हो गया होगा । यह सब मैं अपनी ओर से लिख रहा हूं क्योंकि बवपन में सुनी बात इतनी ही थी कि उस स्त्री नें सुना था कि कोर्इ प्रतीक्षा रत यात्री  युवती ठीकेदार से गिड़गिड़ा रही थी कि भैया छोड़ दीजिए । अब ठीकेदार नें छोड़ा या नहीं या जो किया उसके बाद हत्या कर नदी में ही फेंक देने का निर्णय तो नहीं ले लिया ? क्योंकि यह घटना वहीं घटित हुर्इ हो्रगी जहां लाशें जलार्इ या फेंकी जाती हैं ।तब नदियों में पानी बहुत था और डूबा हुआ सैंकड़ों किलोमीटर दूर बहकर जा सकता हैं । फिर गंगा जैसी नदियों में सांप आदि के काटे शवों को वैसे ही प्रवाहित कर देने की प्रथा है । सिर्फ कफन होने ं और कफन न होने के आधार पर सामान्य और असामान्य मृत्यु का अनुमान लगाया जा सकता है ।
       एक अन्य अविस्मरणीय प्रकरण विश्वविधालयीय शिक्षा-काल का है जब एक सहपाठी नें बिना पूछे ही बताया था कि अमुक नवागन्तुक छात्रा पहले अमुक विभाग में पड़ती थी । बोल्ड और सम्भ््रान्त घरानें की है । एक बार पिकनिक मनाने सहपाठियों के साथ गयी । संभवत: अन्य छात्राओं को अपने अभिभावकों से उस सैर-सपाटे की अनुमति नहीं मिली होगी । पहुंची तो अकेली छात्रा थी । पिकनिक में सहसा या फिर सुनियोजित सामूहिक पशुता जगी और सहपाठियों नें ही उसे मिल-जुलकर अपवित्र कर दिया । उसनें वह विभाग और वह विषय छोड़ दिया और क्योंकि दुनिया छोटी है ,इसलिए उसकी कीर्ति साथ-साथ ही पहुंच गयी होगी । अन्यथा उस सहपाठी को उसका गोपनीय अतीत कैसे मालूम होता । बहुत बाद में एक सेमिनार में वह मुझे फिर दिखी अध्यापिका के रूप में । उसनें अपनी प्रतिभा बचा ली थी लेकिन सिन्दूर से फिर भी वंचित रही वह । बिरादरी और अड़ोसी-पड़ोसी इसतरह की अपकीर्ति पर अपने ढंग से प्रतिशोध लेते हैं । संभवत: व्यावसायिक बिरादरी से थी । अनुमान लगा सकते हैं कि स्वजातियों ने किसप्रकार की टिप्पणियां की होंगीं । चली थी पढ़नें या फिर चले थे पढ़ानें ,और भुगतें ! इसतरह की एक भी दुर्घटना न पढ़नें -पढ़ाने वालों को सशक्त तर्क और औचित्य प्रदान करती है । या फिर दिल्ली में राह चलते फुटपाथ से वहशियों द्वारा किसी बड़ी कार में खींच ली गयी उस विवाहिता युवती को याद कीजिए ,जिस कार नें बिना ट्रैफिक सिगनल तोड़े समाज की सारी मर्यादाएं तोड़ दीं । ऐसे ही एक बार की यात्रा की याद है । भयानक कुहरे में जब सारी सवारियां पहले ही उतर गयीं और मैं भी उतरनें लगा तो उस प्राइवेट बस में बैठी हुर्इ आखिरी सवारी की चिन्ता नें मुझे भी विचलित कर दिया । कुछ ही दिनों पहले प्राइवेट बस में बारिश के दौरान यात्रा कर रही एक अकेली महिला यात्री से उसके ड्राइवर-कन्डक्टर द्वारा ही दुराचार की घटना अखबारों में छपी थी । उस समय मुझे यही सूझा था कि उस महिला का नाम-पता और बस नम्बर उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालनें के लिए नोट कर लिया जाय । 
       विधार्थी-जीवन में ही अधिक सामाजिक और लोकप्रिय होने के चक्कर में अपने ही सहपाठियों के बलात्कार की शिकार उस महिला ने कर्इ किताबें हिन्दी-विषय की अध्यापिका के रूप में लिखी थीं ; लेकिन वह आत्मकथा नहीं लिख सकती थी । उसनें उन दुराचारी सहपाठियों पर भी प्राथमिकी दर्ज नहीं करायी होगी । उसनें नयी स्मृति और नए कार्यक्षेत्र के लिए अपना विषय बदला । अपने दुखद और अपमानजनक अतीत को भुलानें के सृजनात्मक प्रयास में भिन्न क्षेत्र में सम्मान हासिल किया लेकिन उसनें आत्मकथा आज तक नहीं लिखी होगी । क्योंकि इसतरह की हिन्दी में किसी आत्मकथा की सूचना मेरे पास नहीं है ।
           प्रभाखेतान की आत्मकथा 'छिन्नमस्ता संभवत: अपवाद है और उसमें लेखिका नें अपनी अनभिज्ञ किशोर जीवन-काल की मूर्खताओं को भी बेबाक तटस्थता के साथ वाणी दी है । सृजनात्मक मुकित के अविस्मरणीय क्षण घटित करते हुए यह कृति लेखिका की आत्मा पर पड़े हुए अवसाद के पत्थर हटाती हुर्इ निखरती जाती है। प्रभाखेतान की आत्मकथाएं विरेचन का मनोवैज्ञानिक प्रयास लगती हैं । उनके जीवन में सामाजिक कम लेकिन व्यकितगत अधिक घटा है । वह पाठकों को अपने निजी जीवन के ऐसे वर्जित कोनों में ले जाती है जहां जो कुछ घट रहा है वह नितान्त वैयकितक है । पाठक यह भी नहीं सोच पाता कि वह इन लेखकीय अनुभवों का क्या करे ? वह किसी दूसरी दुनिया की कथा लगती है । लेखिका के परवर्ती बौद्धिक स्तर को देखते हुए आत्मकथा में प्रदर्शित भोलापन और अबोधता प्रायोजित एवं अविश्वसनीय लगती है । इसीलिए मैंने इसे परम्पराबत विवाह के लिए अनिच्छुक महिलाओं की दाम्पत्य-त्रासदी या फिर पाश्र्व-दाम्पत्य के रूप् में देखा है । स्वतंत्रता भी एक  सापेक्ष अवधारणा ही है । जातीयता में उपलब्ध पुरुष का असामान्य प्रतिभाशाली महिलाओं की दृषिट में पिछड़ा होनाविकास के एक विशेष काल-खण्ड में ऐतिहासिक सच्चार्इ भी है । प्रभा-खेतान की आत्मकथा इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अप्रत्याशित न होकर सुचिनितत और अपरिहार्य निर्णय के रूप् में सामने आती है । इस तरह की अधिकांश घटनाओं में यधपि भटकाव का भी एक साहसिक रोमांच होता है । कर्इ बार तो बचपन की बाल-सुलभ यौन-जिज्ञासा ही मानक चरित्र के राज-पथ से विचलित कर देती है ;लेकिन राहुल और अज्ञेय और राजेन्द्र यादव की तरह   ही इसे वरण की स्वतंत्रता की समस्या से जोछ़कर भी देखा जाना चाहिए ।
          बहुत पहले कृष्णा अगिनहोत्री की आत्मकथा के कुछ अंश एक पत्रिका में पढ़कर मैंने उनको पत्र भी लिखा था । उन्हे पढ़ते हुए मुझे लगा था कि बहुत से व्यवहार नितान्त वैयकितक भी होते हैं । कुछ लोगों के अनुभवों एवं संवेदनाओं का बहुत सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता । असामान्य मनोविज्ञान की सीमा में आने के कारण ही प्रभा खेतान और कृष्णा अगिनहोत्री की आत्मकथाएं जीवन की घटनाएं कम दुर्घटनाएं अधिक लगती हैं । व्यकितगत जिद और अहं,अलग रहने का निर्णय ,दूसरों को बर्दाश्त न कर पाने वाली असहिष्णुता जो कभी-कभी पति-पत्नी की एक-दूसरे से की गयी अधिक अपेक्षाओं का परिणाम भी होती है -कथापूर्ण होने के बावजूद बहुत अधिक पाठकीय सहानुभूति अर्जित नहीं कर पातीं । यधपि उनके साथ घटी दुर्घटना भी सामाजिक विकास और परिवर्तन की ऐतिहासिक त्रासदी की ही उपज है । वे एक आदर्श ,आधुनिक और उदार पुरुष की खोज में भटकती हैं । दरअसल आदर्श दाम्पत्य एक आदर्श सामाजिक अनुशासन में ही संभव है । असामाजिक-असम्बद्ध समर्पणविहीन दाम्पत्य की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती । आश्रित एवं अनुचर पुरुष-सहचर की खोज निर्भर,आश्रित या विकलांग दाम्पत्य में ही संभव है । व्यकितत्व की स्वंतंत्रता के साथ दाम्पत्य की खोज आज भी भारतीय समाज के स्त्री की प्रमुख समस्या है । क्योंकि दाम्पत्य एक सामाजिक अवधारणा है इसालिए स्त्री-विमर्श के नाम पर असामाजिक दाम्पत्य की परिकल्पना मैं नहीं कर पाता । हमें दाम्पत्य की सामाजिकता में ही सही स्त्री-विमर्श की तलाश करनी होगी ,यह दूसरी बात है कि सही स्त्री विमर्श सही सामाजिक विमर्श से ही संभव है । 
      ंहिन्दी में ऐसी बहुत कम स्त्री-आत्मकथाएं हैं जो पाठकों में अन्याय का संवेदनात्मक बोध और क्षोभ जगा पाती हैं । इस दृषिट से चन्द्रकिरण सौनरेक्सा, मैत्रेयी पुष्पा (कस्तूरी कुण्डल बसै के लिए ) मन्नू भेडारी और मैत्रेयी पुष्पा (गुडि़या भीतर गुडि़या के लिए ) की आत्मकथाएं क्रमश: उतरते क्रम में ठीक और प्रभावी लगीं । आंचलिक भाषा का पुट ,अभिव्यकित की मनोहारी सृजनात्मकता और आवेग की तीव्रता के आधार पर मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथा का जवाब नहीं है । उसे विवाहित पुरुषों को अनिवार्य पाठय-पुस्तक के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए ताकि वे दूल्हन के घूंघट में छिपी किसी मैत्रेयी पुष्पा को समय रहते ही पहचान सकें और समाज की अधिक क्षति न हो । हर जीवन वृहत्तर समाज की सम्पतित भी है ,उसे विवाह का लाइसेंस मिलते ही पुरुष अपनी निजी सम्पतित में बदलने लगता है । कभी-कभी ऐसा सुरक्षा एवं प्यार के नाम पर ही होता है , लेकिन भारतीय समाज में बार-बार विवाह करने के विकल्प पुरुष के लिए भी कम ही हैं ,कभी-कभी तो एक भी-सलमान खान और राहुल गांधी इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं । इसीलिए मेरे पाठकीय मन ने मैत्रेयी के डाक्टर पति का मरीजों को देखना छोड़कर अपनी पत्नी की जासूसी के लिए आवास पर असमय आ जाना क्षम्य लगा । रिश्ते बन जानेे के बाद रिश्तेदार को बचाना भी स्वयं को बचाने के समान ही हो जाता है । पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के लिए पुरुष की एक भूमिका सुरक्षा-डाग की भी है । क्यों कि पुरुष रूपी कुत्ता कभी भी पागल होकर किसी भी महिला को कभी भी काट सकता है । इस लिए मेरा व्यावहारिक सुझाव न चाहते हुए भी यह रहेगा कि स्त्री-विमर्श एवं परिवर्तनकारी जागरूकता अभियान चलता रहे लेकिन वास्तविक जीवन में आपराधिक संभावनाओं को देखते हुए स्वतंत्रता के जोखिमपूर्ण आत्मविश्वास से बचें क्योंकि आपराधिक जीन विवेक और विचार से नहीं संचालित होते ।
        सम्पर्क -बी-1,श्री सांर्इ अपार्टमण्ट,टंडि़या,करौंदी,सुन्दरपुर,वाराणसी(उ0प्र0) पिन-221005
          मोबाइल नं0 09451342730   र्इ-मेल-तंचतानहउंपसण्बवउ

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

समाजिक मुकित में भाषा-बोध की युकित


प्राचीन भारत में जाति नहीं बदली जा सकती थी लेकिन जाति की निरर्थकता को समझा जा सकता था .क्योंकि वह प्राचीन कालसे ही माया-जगत का हिस्सा और किस्सा रहा है.एक पूरी जाति इस मायावाद के प्रचार में लगी रही.यह सब प्राचीन आदर्शवाद का हिस्सा था .आज जब कि भारत में बलात्कारी बढ़ गए हैं .भारत की प्राचीन सांस्कृतिक अभियांत्रिकी यद् आती है.तब स्त्री-संसर्ग से विरत रहने वाला महिमा-मंडित किया जाता था .लक्ष्य पुरुषोत्तम बनाने का था .ब्रह्मचारी रहना एक चुनौती पूर्ण लक्ष्य था .पुरुष होने के बोध से मुक्त एक जीवन .सदाचारी होना पुरुषार्थ के लिए एक चुनौती था .
       संभव है कि ऐसे लोगों ने भौतिकवादी अर्थ में स्त्री -संसर्ग से विरत रहकर अपना नुकसान किया हो .लेकिन उन्होंने समाज को एक संयमी जीवन जीने का चुनौतीपूर्ण लक्ष्य दिया था .संभवतः यौन -भावना के प्रति नकारात्मक चिंतन से ही उसके हारमोनो को जीता जा सकता था .उन्होंने ऐसा ही किया .उन्होंने मानवीय अस्मिता  से सम्बंधित ज्ञान की निरर्थकता को अपने भाषा -चिन्तन  के क्रम में पाया था .शब्दों के अर्थ की प्रकिया को समझते-समझाते वे ज्ञान से परे के उस चित्त तक पंच पाए ,जहाँ से शब्दों की अर्थवान दुनिया शुरू होती है .भाषावैज्ञानिक चिंतन के क्रम में ही वे अवधारणाओं से पर के उस रहस्यमय अपरिभाषित चित्त को जान पाए थे जिसे नेति -नेति कहा और ब्रह्म भी .भारतीय लोक के ज्ञानात्मक  अतिक्रमण के लिए यह लोकोत्तर प्रवास जरुरी था -चाहे यह ज्ञान या बोध के स्तर पर ही क्यों न रहा हो
       मेरी दृष्टि में आज भी इस भाषा बोध की आवश्यकता बनी हुई है .यह चाहे रहस्यमय और सर्वव्यापी ईश्वर की उपस्थिति या साक्षात्कार के रूप में न हो ,लेकिन यह भारतीयों के विषमतापूर्ण अस्मिताकरण से मुक्ति के लिए अब भी प्रासंगिक हो सकता है अर्थकरण की प्रक्रिया को पहचानकर हम अपने चित्त के जातिकरण की प्रक्रिया को भी पहचान सकते हैं और उससे मुक्त हो सकते हैं . .
         इस परिप्रेक्ष्य में रखकर देंखें तो भारतीयों की समस्या यह है कि जन-सामान्य सिर्फ भाषा का प्रयोग ही जानता है ,उसका मर्म नहीं  ।वह अपने अधिकांश-बोध में भाषा की स्थार्इ निर्मिति या वस्तु उत्पाद की तरह है । भाषा का एक जड़ संसार उसकी अर्थजीवी चेतना को नियनित्रत करता है । प्राचीन भारतीय विद्वानों नें भाषा के पार की उस दुनिया को जीवन और संसार की सीमा से परे ब्रहम की सत्त के रूप में देखा । वे चाहते तो इस ज्ञान का उपयोग भारतीयों को जातिवादी कुण्ठा से निकालने के लिए कर सकते थे । लेकिन इससे भाषा-ग्रस्त मानव-संसाधन की सामाजिक अभियानित्रकी ध्वस्त हो जाती । उन्होंने लोक को जाति-चिन्तन के लिए छोड़कर एक सीमित वर्ग को ब्रहम-चिन्तन की ओर मोड़ दिया ।
          आज भी कर्इ लोग अपनी जाति और धर्म के लिए कुणिठत रहते है और कर्इ लोग र्इश्वर को होने न होने को लेकर । निहित स्वाथोर्ं के कारण मानव समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी नहीं चाहता कि लोग शासित होने और दूसरों को बड़ा मानने की अपनी आदत छोड़ें ।  वे लाभ की सिथति में हैं इस लिए किसी भी प्रकार से अपनी सांस्कृतिक-सामाजिक आदत या व्यसन कोे बनाए रखना चाहते हैं । यह जानते हुए भी कि शब्द के सच सामाजिक रूप से माने हुए ही होते हैं ,वे नहीं चाहते कि सामान्य जनता इस झूठ की भाषावैज्ञानिक- सृजनशीलता को जानें । शब्द-विज्ञान से देखें तो कौन कह सकता है कि र्इश्वर का नाम र्इश्वर ही है । शब्दों में निहित सारे अर्थ एक आभासी दुनिया की सृषिट करते हैं और दिमाग के भीतर चिन्तन के उपकरण के रूप में इश्तेमाल करने के लिए दिमाग के बाहर से लिए गए हैं । वे हमारे मसितष्क में बाहरी दुनिया का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
         भाषा-विज्ञान के नजरिए से जब देखता हूं तो दलित-दलित चिल्लाना भी अप्रत्यक्ष रूप से नर्इ पीढ़ी को गुमराह करने के लिए एक भाषा-वैज्ञानिक झूठ को सच बनाने का कूटनीतिक उपक्रम ही लगता है । जो काम राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रभुत्वशाली वर्ग नें हजारों वषों्र तक किया उसे अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रभावित वर्ग का नेतृत्व स्वयं एवं सहर्ष कर रहा है ।
           मेरा मानना है कि प्राचीन एवं आधुनिक भाषा-विज्ञान का इश्तेमाल जातिवाद और साम्प्रदायिकता से मुकित के लिए किया जा सकता है । मैं कौन हूं का प्रश्न और तर्क सिर्फ प्राचीन भारतीयों की तरह सिर्फ ब्रहम को जानने के लिए ही नहीं किया जाना चाहिए ,इस बोध का उपयोग जाति और सम्प्रदाय-बोध से बाहर निकलने और निकालने के लिए भी किया जा सकता है । यह मुकितदायक-ज्ञानवद्र्धक प्रश्नोत्तर कुछ इसप्रकार होगा-
      प्रश्न- तुममैं कौन ?
      उत्तर- तुम  मैं एक माने गए शब्द हैं ।
      प्रश्न- कैसे शब्द ?
      उत्तर- दूसरों के द्वारा दिए गए अर्थ वाले ....
एक नए समाज की रचना पुराने शब्दों से दूरी बनाए बिना संभव नहीं है । यदि किसी को परम्परा से मिले अर्थ पसन्द नहीं हैं तो उससे अलग होने की सोचे और सामूहिक बहिष्कार जीना सीखे । सभ्यता या असभ्यता से मिले हीनता या श्रेष्ठताबोधक काल्पनिक किन्तु सच की तरह जिए जाने वाले भाषावैज्ञानिक यानित्रकबोध से बाहर निकलने के लिए भाषा एवं शब्द-विज्ञान की सहायता लेनी होगी । राजनीतिज्ञ तो झूठ को भी सचके रूप् में विज्ञापित कर दंगा करा देता है । इसप्रकार समस्या यही है कि विश्व के अधिकांश लोग आज भी भाषावैज्ञानिक दृषिट सेमूर्ख या अज्ञानी हैं । वे जिस चीज से मुक्त होने के लिए संशर्ष कर रहे होते हैं,उसे ही अपने कार्य और व्यवहार की जीवन-चर्या से सच करते जाते हैं ।


शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

ज्ञानरंजन की कहानियां : सभ्यता-समीक्षा का काव्यात्मक विमर्श

 पाखी के ज्ञानरंजन अंक सितम्बर 2012 में प्रकाशित 

ज्ञानरंजन की अधिकांश कहानियों के पाठकीय अनुभव की तुलना शाम को बाजार या पिफर किसी मेले में द्घूमने से भी की जा सकती है। बाजार द्घूमने गया व्यक्ति कब मेला या बाजार देखने लगेगा और कब कुछ खरीदने लगेगा-कहा ही नहीं जा सकता। उनकी 'पिता' कहानी को ही लें तो पिता तक पहुँचने से पहले, और अंत तक भी पाठक यह अनुमान लगाने में असमर्थ ही रहता है कि कहानी के पिता ने ऐसा क्या किया होगा जो कहानी के नायक बने। ज्ञानरंजन का कहानीकार अपने पाठकों की इस प्रत्याशा से भी सृजनात्मक चुहल या शरारत करता है। कहानी के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते कहानी के पिता पाठकों से अपना नायकत्व स्वीकार करवा ही लेते हैं।


ज्ञानरंजन की कहानियाँ : 

सभ्यता-समीक्षा का काव्यात्मक विमर्श

                                                           रामप्रकाश कुशवाहा 

हिंदी में ज्ञानरंजन जीवन-विमर्श की कहानियाँ लिखने वाले अनूठे एवं संभवतः अकेले कथाकार हैं। उनकी कहानियाँ बाहरी दुनिया की द्घटनाओं के वर्णन से नहीं, बल्कि एक आम व्यक्ति के एकान्त और मौन मानसिक साक्षात्कार की मुद्रा में, मानवीय अनुभूतियों और संवेदनशील अनुभवों के लयात्मक प्रतिसंसार के साथ, आत्मसंवाद और आत्मसाक्षात्कार के शिल्प में बुनी गयी हैं। ज्ञानरंजन अपने पहले के, अपनी पीढ़ी के और परवर्ती पीढ़ी के प्रसि( कहानीकारों के बीच सबसे अधिक समाज मनोवैज्ञानिक विश्लेषक अन्तर्दृष्टि से संपन्न कहानीकार हैं। उनकी कहानियों के शीर्षक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा मनोविकारों पर लिखे गए निबंधों की याद दिलाते हैं, यह याद उनकी सूक्ष्म और विश्वसनीय मौलिक समझ के लिए भी आती है। हास्य रस, अनुभव और संबंध आदि कुछ ऐसे ही शीर्षक हैं। ज्ञानरंजन आधुनिक युग के मनुष्य के लिए नई जीवन-दृष्टि और मौलिक सूक्तियों के सर्जक कहानीकार हैं। वे अपनी कहानियों में जिस तरह बहुस्तरीय समाज के परस्पर विरोधी यथार्थ और जीवन-दृष्टियों से खेलते और उन्हें खोलते हैं, वह संवेदना और समझदारी दोनों ही स्तरों पर मानसिक मुक्ति का रोचक वृत्तान्त द्घटित करती हैं। उनकी सभी कहानियाँ अपने पाठकों को मोहभंग की चेतना और चेतावनी की समझदारी से गुजारती हैं। कुछ ऐसे कि जैसे वे अपने पाठकों को दुनियादारी के प्रति अधिक समझदार बनाने के मिशन का एक हिस्सा हैं। वे किसी भी तरह से बेवकूपफ बनाए जाने के विरु( रचनात्मक नपफरत से भरी हैं। उनकी कहानियाँ जहाँ एक ओर आधुनिकता की दृष्टि से जड़ता की मानवीय वृत्तियों एवं दुर्बलताओं का अनुसन्धानपरक लेखा प्रस्तुत करती हैं, तो दूसरी ओर आधुनिकता में निहित मानवीय पर्यावरण के विनाश और विस्थापन के संभावित खतरों के प्रति भी निर्मम चेतावनी जारी करती हैं। समझदार एवं दार्शनिक व्यंग्य ज्ञानरंजन की सभी कहानियों की अनिवार्य विशेषता हैं। वे प्रगीतात्मक आत्माभिव्यक्ति की शैली के कहानीकार हैं। प्रथम पुरुष की कथात्मक मुद्रा का शिल्प उनकी कहानियों को विश्वसनीय तो बनाता ही है,वह उनकी उस विचारशीलता के निवेश के लिए भी स्वाभाविक रूप से अधिक अवसर उपलब्ध कराता है जो उनकी कहानियों का मुख्य गुण है। ज्ञानरंजन की कहानियाँ परम्परागत अर्थों में कहानियाँ हैं भी नहीं। कथानक की दृष्टि से देखें तो कई कहानियाँ किसी बड़ी कहानी की भूमिका लगती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अभी पात्रा-परिचय चल रहा है और कहानी आगे अभी द्घटेगी कि सहसा कहानी खत्म हो जाने की सूचना देने वाला पृष्ठ आ जाता है। पाठक पिफर पलटकर कहानी के बारे में सोचने लगता है और पाता है कि इस मुद्दे पर तो कुछ बचा ही नहीं और संतुष्ट होकर उनकी कहानियों से मिलने वाले पाठकीय अनुभव को जीवन भर नहीं भूल पाता। उनकी कोई भी कहानी द्घटनाओं में याद नहीं रहती, बल्कि प्रभावों में याद रहती है। इस तरह ज्ञानरंजन की कहानियाँ जीवन को जानने-समझने के उपक्रम में ही संपन्न होती हैं। वे जीवन से साक्षात्कार की मानसिक यात्राा हैं। वे कथानक के पात्राों में द्घटित नहीं होतीें बल्कि पूरी ईमानदारी के साथ लेखक के भीतर द्घटित होती हैं। उदाहरण के लिए अन्य कहानीकार जहाँ चरित्राों का चित्राण करते हैं, वहाँ ज्ञानरंजन की कहानियाँ पात्राों-चरित्राों के बारे में लेखक की समझदारी या अभिमत का चित्राण करती हैं। इस तरह ज्ञानरंजन की कहानियाँ जीवन के साक्षात्कार की कहानियाँ हैं। मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य कहानीकार ने कहानी के इस रूप में भी होने की परिकल्पना की है। कमलेश्वर अपने बनाए नई कहानी के सूत्राों पर ही रीझे और खोए रहे। यद्यपि उन्होंने और उनकी पीढ़ी के अन्य कहानीकारों ने कहानी को चौंकाने वाले अन्त के शिल्प से मुक्त किया। यद्यपि चौंकाने की आदत गई नहीं और वह पूरे कथानक की परिकल्पना में ही पफैल गयी या समाहित हो गयी। चौंकाने वाला शिल्प तो 'कितने पाकिस्तान' जैसे उपन्यास तक चलता रहा। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और चित्राण अज्ञेय की कहानियों में भी था। मनोवैज्ञानिक शब्दावली में कहें तो ज्ञानरंजन की कहानियाँ जीवन के प्रत्यक्षीकरण की कहानियाँ हैं। वे साक्षात्कार, विश्लेषण और समझदारी की प्रक्रिया में द्घटित होती हैं। उनकी कहानियों का आस्वाद जीवन के नए अन्वेषण और उद्द्घाटन का आस्वाद है। इन्ही विशेषताओं के कारण मुझे हिन्दी में ज्ञानरंजन जैसा कोई दूसरा कहानीकार नहीं दिखता। अपनी पूर्ववर्ती नई कहानियों से अलग उनकी कहानियाँ कहानी की बिल्कुल नई परिकल्पना की कहानियाँ हैं। ज्ञानरंजन की कहानियों को पढ़ते समय दो-तीन बातें मन में उभरती हैं। वे हिन्दी के गिने-चुने कहानीकारों में से एक हैं जिन्होंने प्रतिमान कहानियाँ लिखी हैं। अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह लगती है कि वे लेखकीय अनुभव के ही कथाकार नहीं हैं बल्कि लेखकीय मूड या मनःस्थिति के भी चितेरे कथाकार है। यह विशेषता हिन्दी के दो-तीन लेखकों में ही मुझे दिखाई देती है। उनके पहले मोहन राकेश, शिवप्रसाद सिंह और उनके बाद उदयप्रकाश की कहानियों में यह विशेषता मुझे दीखती है। उनकी हर कहानी एक अलग संवेदनात्मक मनःस्थिति की उपज है। यद्यपि शिवमूर्ति की कहानी 'कसाईबाड़ा', संजीव की 'अपराध' और अखिलेश की 'चिट्ठी' में भी एक विशेष संवेदनात्मक मनःस्थिति कहानी की अन्तःप्रेरणा और कथा-वस्तु के परिचालन में देखी जा सकती है, लेकिन उनकी अन्य कहानियों के कथात्मक आयाम भिन्न-भिन्न भी हैं। यह कुछ-कुछ वैसा ही अनुभव है जैसे धूप का रंग बदलने से देखे जाने वाले दृश्य का आस्वाद बदलता है। उन्हें पढ़ते हुए पाठक सिपर्फ कथ्य में ही नहीं बल्कि मूड में भी यात्राा करता है। राजकमल से प्रकाशित अपनी पुस्तक प्रतिनिधि कहानियाँ की भूमिका में इसी बात को उन्होंने कई तरह से संकेतित किया है। 'अपनी कहानियों पर चर्चा करना, उनको छाँटना और एक प्रकार से उनमें लौटना मुझे बहुत उत्साहवर्(क नहीं लगता है। वास्तव में कुछ समय के लिए भी वापस जाने की इच्छा नहीं होती। ऐसा नहीं हुआ है कि मैंने छपकर आई अपनी किसी कहानी को पढ़ा हो। छपी कहानी दिल को एकाएक रद्द कहानी लगने लगती थी। केवल एक कहानी 'संबंध' को छोड़कर, जिसे मैंने कई बार कविता की तरह पढ़ा है, शायद उसे अब भी पढ़ सकता हूँ। ...संबंध को मैंने एक सपाटे में लिखा है। 'द्घण्टा' और 'बहिर्गमन' कहानियों ने कापफी परिश्रम करवाया, लेकिन उनको लिखते वक्त मैं अपूर्व 'कॉमिकल' मनःस्थिति में था। दूसरी कहानियों में आगे या पीछे या साथ-साथ यातना थी या ठसपन या क्षोभ।' स्पष्ट है कि ज्ञानरंजन की कहानियों एवं कहानीकला की कुन्जी रचना-क्षण के उनके सृजनशील चित्त या मूड में छिपी हुई है। इसीलिए अपनी ही कहानियों को पढ़ना उनके लिए रचना-क्षण के मूड से बाहर निकल जाने के कारण कभी आसान नहीं रहा। उनकी बहुचर्चित प्रतिनिधि कहानियों को देखें तो दूसरी चीज यह सामने आती है कि उनकी हर कहानी जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर उनके वैचारिक साक्षात्कार और विशेषज्ञ समझदारी की भी उपज है। अपनी प्रायः सभी कहानियों में कहानी के अन्तरंग तक पहुँचने से पहले ज्ञानरंजन मानो उसकी भूमिका के रूप में कथानायक की मनःस्थिति,विचारों, सूचनाओं और जीवन के लम्बे-लम्बे वर्णन के गलियारों से अपने पाठकों को गुजारते हैं। जरूरी नहीं कि ये वर्णन कहानी के आरंभ में ही आएँ, वे कभी भी, कहीं भी शुरू हो सकते हैं और कभी भी खत्म। ज्ञानरंजन के ये वर्णन नाटक शुरू होने के पहले सूत्राधार के परिचयात्मक भाषण की तरह भी हो सकते हैं और मुख्य कार्यक्रम को प्रस्तुत करने में हो रहे विलम्ब से ध्यान हटाने के लिए किए जाने वाले गंभीर प्रहसनों की तरह भी, लेकिन अधिकांश में ये पृष्ठभूमि के रंग और परिवेश को ही सूक्ष्मता से उभारते हैं। कई बार तो उनके अवान्तर वर्णन और चर्चाओं में ही पाठक इतना तल्लीन हो जाता है कि उसे याद ही नहीं रहता कि वह कोई कहानी पढ़ने बैठा है और अब तक उसके सामने कहानी का कोई टुकड़ा आ जाना चाहिए था या उसके आने में अनावश्यक विलम्ब हो रहा है। ज्ञानरंजन की अधिकांश कहानियों के पाठकीय अनुभव की तुलना शाम को बाजार या पिफर किसी मेले में द्घूमने से भी की जा सकती है। बाजार द्घूमने गया व्यक्ति कब मेला या बाजार देखने लगेगा और कब कुछ खरीदने लगेगा-कहा ही नहीं जा सकता। उनकी 'पिता' कहानी को ही लें तो पिता तक पहुँचने से पहले, और अंत तक भी पाठक यह अनुमान लगाने में असमर्थ ही रहता है कि कहानी के पिता ने ऐसा क्या किया होगा जो कहानी के नायक बने। ज्ञानरंजन का कहानीकार अपने पाठकों की इस प्रत्याशा से भी सृजनात्मक चुहल या शरारत करता है। कहानी के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते कहानी के पिता पाठकों से अपना नायकत्व स्वीकार करवा ही लेते हैं। पाठक एक कभी भी न भुलाए जाने वाले पिता के कथात्मक साक्षात्कार से संतुष्ट होकर कहानी समाप्त करता है। एक कहानीकार के रूप में ज्ञानरंजन की सपफलता इसमें है कि कहानी जिन्दगी के एक भोगे और जिए जा रहे क्षण की अनुभूतियों और पात्राों की सारी मानसिक प्रक्रियाओं तथा यथार्थ के साथ पाठक में भी संचरित-संक्रमित-संप्रेषित हो जाती है। ज्ञानरंजन की इस रचना-प्रक्रिया का रहस्य प्रायः उनकी सभी कहानियों के कविता होने में छिपा है। एक तरह से उनकी कहानियाँ समकालीन मनुष्य के अंतर्जगत की सेंधमारी से उत्पन्न हुई हैं, जिसे परंपरागत आध्यात्मिक शब्दावली में परकाया प्रवेश कहते हैं। यद्यपि भूमिका में उन्होंने सिपर्फ 'संबंध' कहानी का ही कविता होना स्वीकार किया है और लिखा भी है कि केवल एक कहानी 'संबंध' को छोड़कर, जिसे मैंने कई बार कविता की तरह पढ़ा है, शायद उसे अभी भी पढ़ सकता हूँ। किसी वास्तविक कहानी की रचना के पीछे कभी-कभी यह भी हुआ है कि एक कविता ने उसका निर्माण कर दिया। ज्ञानरंजन की कहानियों को जो चीज महत्वपूर्ण बनाती है, वह है जीवन और यथार्थ को देखने-समझने की उनकी बहुआयामी समझदारी, अभिव्यक्ति और विश्लेषण की सजग-स्वतंत्राता-यहाँ तक कि परस्पर विरोधी मानवीय सच्चाइयों को भी एक साथ देखने-समझने की क्षमता भी। वे समाज मनोवैज्ञानिक नजरिए से दृष्टिसंपन्न कथाकार हैं। उन्होंने अपनी कम ही कहानियों में अपनी निजी और मौलिक सूक्ष्म निरीक्षण-शक्ति और जीवनानुभवों को पूरी ताकत से झोंक दिया है। उनके पात्रा और कथानक इसी निवेश के बहाने बन गए हैं। उनकी इस विशेषता को समझने के लिए उनकी 'रचना-प्रक्रिया 'शीर्षक कहानी को देखा जा सकता है। यह कहानी युवक-युवती के प्रेम पर और उसके प्रति आम सामाजिक व्यवहार और दृष्टिकोण पर व्यापक समाज मनोवैज्ञानिक ब्यौरे और तथ्य सामने लाती है। कहानी सबसे पहले शहर की जनसंख्या और प्रेम के चरित्रा के बदलते स्वरूप और आनुपातिक रिश्ते बतलाती है। 'जनसंख्या न सिपर्फ प्रेम का विकल्प देती है, बल्कि अव्यवस्था और उपलब्धता के बीच वर्जनाओं के अनुशासन से आजादी भी। प्रेमी भी एक बड़ी भीड़ के बीच किसी पागल की तरह एक सामान्य उपस्थिति के रूप में द्घटित हो सकता है।' 'पहले प्रेम के पीछे कुरबानी भी बहुत होती थी, पर अब ऐसा नहीं के बराबर है, क्योंकि एक प्रेम चला जाता है तो दूसरा तुरन्त उपस्थित हो जाता है। और 'ऐसी जगहों में अगर कोई लड़की किसी को अपना सतीत्व सौंपना चाहे या सौंप दे तो दूसरे अलसेट नहीं देंगे क्योंकि जनसंख्या ज्यादा होती है।' ;वही, पृ. ४१द्ध 'छोटे शहर में यह नहीं हो सकता। इसके लिए भीड़ और जनसंख्या जरूरी है।' ;वही, पृ. ५०द्ध यद्यपि यह आजादी सामन्ती मूल्यों वाले भारतीय समाज की सीमा समाप्त हो जाने के कारण ही शहरों में मिलती है, लेकिन लेखक पाता है कि छोटे शहरों में सामन्ती ग्रामीण समाज का शहरी जीवन में भी नियन्त्राण और हस्तक्षेप बना रहता है। इसीलिए बड़ी जनसंख्या वाले शहर का जीवन प्रेम का सामन्ती वर्जनाओं से मुक्त उत्सव बना पाता है। ज्ञानरंजन की यह कहानी इसी उत्सव का रेखांकन प्रस्तुत करती है। ज्ञानरंजन की 'रचना-प्रक्रिया' कहानी बहुत चुपके से एक स्त्राी होने के ग्लैमर के पीछे सामान्य प्राकृतिक जैविक वजूद का मोहभंग होने के स्तर तक रेखांकन करती चलती है-'मैंने कभी उसे उंगली डालकर नाक सापफ करते नहीं देखा और न जंद्घों के बीच साड़ी खोंसते। मैं समझता हूँ उसे कब्ज भी नहीं रहता था।' ;वही, पृ.४७द्ध यह कहानी प्रेम-भावना के बौ(कि, मानसिक और शारीरिक सभी आयामों, भंगिमाओं और हश्र को पाठकों के सामने जिंदगी की समझदारी के रूप में रख देती है-'बड़े शहर की लड़की चिंतन-मनन करने वाली होती है और देह में सौंदर्य दिमाग की मापर्फत आता है।' ;वही, पृ.४८द्ध ज्ञानरंजन की नजर वहाँ तक जाती है, जहाँ प्रेम के प्रति वर्जनाएँ और प्रतिरोध उसे ;कथानायक के 'मैं' के रूप में युवा पीढ़ी कोद्ध उकसाने वाले क्रान्तिकारी लक्ष्य में बदल देते हैं। जहाँ प्रेम एक विशु( परिद्घटना न रहकर चिढ़े हुए युवा जीवन का एक रोमांचक लक्ष्य बन जाता है। गौण होते हुए भी मुख्य एवं निर्णायक जीवन-लक्ष्य का रूप लेते हुए। यह प्रेम के मनोविज्ञान का एक रिवर्स है, जिस पर ज्ञानरंजन की यह कहानी ध्यान दिलाती है। ज्ञानरंजन की 'संबंध' सिपर्फ उनकी ही नहीं बल्कि हिन्दी और विश्व-साहित्य की भी ऐसी कहानी है जिसे एक बार पढ़ने के बाद शायद ही कोई भूल पाए। यह कहानी रात के अंधेरे से सुबह के उजाले तक एककालिक यात्राा के शिल्प में सृजित हुई है। ज्ञानरंजन की यह कहानी अपने बहुस्तरीय कलात्मक शिल्प, मनोवैज्ञानिक वातावरण और रचनात्मक चुनौती की दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण कहानी है। इसके सभी पात्रा अपनी सामान्य एवं प्रत्यक्ष कथात्मक उपस्थिति के साथ-साथ अलग काव्यात्मक प्रयोजन तथा प्रतीकात्मक दार्शनिक निष्पत्ति भी रखते हैं। कहानी के मुख्य या कथावाचक पात्रा जो अपने समय का असंतुष्ट और निर्मम भाष्यकार है और सारी कहानी उसकी ही मानसिकता और टिप्पणियों के माध्यम से समय का विमर्श और साक्षात्कार प्रस्तुत करती चलती है, लेकिन एक बड़े कहानीकार के रूप में ज्ञानरंजन की सजगता और सपफलता यह है कि माँ के रूप मे स्वस्थ और आदर्श मानवीय संबंधों का संवेदनात्मक नेपथ्य बनाए रखते हैं। माँ सभ्यता के एक सुरक्षित पाठ की तरह है, जो अस्तित्व के विरु( सारी नकारात्मकताओं और साजिशों का निषेध है। वह जिंदगी के पक्ष में निर्णायक, अन्तहीन और अपराजेय संद्घर्ष की प्रतीक है। जीवन की नकारात्मकताओं और निषेध से आक्रान्त कथावाचक मुख्य पात्रा 'मैं' समय के अंधेरे के व्यंग्यात्मक अधिवक्ता के रूप में इस कहानी का भाषित होना संभव करता है। बेरोजगार भाई जो व्यवस्था की क्रूरता का मुख्य शिकार तथा जीवन के प्रति तमाम दुःस्वप्नों और आशंकाओं का मुख्य सूत्राधार है, कहानी के अन्त में स्वस्थ जिजीविषा और सक्रियता के प्रकाशमान प्रतीक के रूप में लौटता है। सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर इस कहानी का विश्लेषण करें तो यह कहानी आर्थिक तंगी में गुजरते मध्यवर्ग के करोड़ों परिवारों की जीवन-त्राासदी और सच्चाई छिपाए हुए है। यह अमानवीय होती व्यवस्था से कुचलते हुए मृत्यु के कगार पर जा पहुँचे परिवारों पर लिखी गई एक संवेदनाधर्मी महाकाव्यात्मक कहानी है। हिन्दी में भी ऐसी कहानी लिखी गई है, इसे पढ़कर आश्चर्य ही होता है। प्रेमचन्द की प्रसि( कहानी 'कपफन' की तरह यह भी व्यवस्था के संपूर्ण अमानवीकरण और संपूर्ण मोहभंग की कहानी है। त्राासद यथार्थ का आरेखन इस कहानी में क्रूर, आपराधिक और हत्यारी विचारशीलता के सहारे किया गया है। यह कहानी करुणा या दया-मृत्यु के लिए लिखी गई याचिका की तरह है-'दरअसल मैं तपाक से, अपने भाई के बारे में यह सोचने पर मजबूर हो गया कि उस बेचारे को मर ही जाना चाहिए। मैं नहीं जानता कि इस खयाल की मैंने चुपचाप खोज की हो। हो सकता है इसमें कुछ दया-भाव हो लेकिन हकीकत यह है कि मैं कापफी देर बाद भी यही चाहता रहा कि वह आत्महत्या कर ले और एक बहुत ही द्घिसटती हुई निर्मम समस्या का समाधान हो जाए।' ;प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ.७५द्ध यह कहानी एक विस्पफोटक और झिंझोड़ देने वाले संवेदनात्मक साक्षात्कार और जीवन-पीड़ा का साक्षात्कार कराती है। कथा-भाषा की सृजनशीलता अपने चरम पर है। यह एक चिढ़ी हुई, प्रतिक्रियात्मक और निर्णायक भाषा है। गहरी द्घृणा की संवेदना और विद्रोही मानसिकता से निकली हुई भाषा। इसी रूप में यह एक क्रान्तिकारी कहानी है-'इतना मैं अवश्य जानता हूँ कि भाई की मृत्यु अगर हो गई तो निश्चितरुपेण मेरा गणित ठीक उतरेगा और यह समझा जा सकेगा कि वाकई मृत्यु से सबको पफायदा हुआ है।' ;प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ.७७द्ध जीवन एक अवांछित उत्पाद की तरह है और पूंजीवादी व्यवस्था की निरंकुश संवेदनहीनता उसके साथ पूरी तरह अवैध होने जैसा व्यवहार करती है। दुःस्वप्न और आशंकाओं की संवेदनात्मक मनोभूमि पर सृजित इस कहानी का सुखद अंत जीवन के स्वीकार का प्रतीक है। रात को आत्महत्या कर लेने की समस्त आशंकाओं को झुठलाते हुए भाई का सुबह व्यायाम करते पाया जाना ज्ञानरंजन के कहानीकार को पूर्ववर्ती नई कहानी के भाष्यकारों-कहानीकारों की चरमोत्कर्ष तथा निष्कर्षविहीन कहानी लिखने की परंपरा को न सिपर्फ झुठलाने की सूचना देता है, बल्कि साठोत्तरी पीढ़ी को कुंठा काल का रचनाकार होने की आमधारणा को भी खारिज करता है। अपने समय में ज्ञानरंजन की कहानियाँ प्रतिरोध और अतिक्रमण का विमर्श रचती है। जाहिर है यह प्रतिरोध अपने अमानवीय समय के अस्वीकार और अतिक्रमण से ही निर्मित हुआ है। आत्महत्या जैसे शास्त्रा-निन्दित पापकर्म को मानव-अस्तित्व के स्वाभिमान और मुक्ति के सम्मानजनक प्रतीक के रूप में चित्रिात करना इस कहानी को व्यवस्था के विरु( द्घृणा की भीषण और चरमान्तक व्यंग्य-अभिव्यक्ति में बदल देता है । 'पिता' कहानी मुझे मध्यवर्गीय परिवार में दो अलग-अलग पीढ़ियों की जीवन-दृष्टि और मानसिकता में हो रही रोमांचक मुठभेड़ लगती है। यहाँ सिपर्फ मध्य-वर्ग ही नहीं है बल्कि मध्य-युग भी है-'अपनी परंपराओं और मूल्यों के साथ एक संस्कृति के वाहक अभिभावक के रूप में। आधुनिकता में पले-बढ़े बेटे उसे समझ नहीं पाते क्योंकि पिता अपने पिता की स्मृतियों से परिचालित बोध और कर्तव्य बोध को जी रहा है। वह एक युगों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा का संविधान जीने वाला पिता है। कहानीकार उसके कष्टों का इस प्रकार वर्णन करता है जैसे बाइबिल में यीशु मसीह का पकड़े जाने और क्रूस पर चढ़ने वाले दिन के पूर्व रात्रिा का किया गया है। पिता का स्वाभिमान और यातना दोनों ही परंपराओं की भव्य विरासत को जीवन-मूल्य के रूप में जीने के प्रयास में शहीद हो रहे एक पिता की यातना है। यह कहानी वृ(ों एवं अभिभावकों के प्रति एक करुणामय प्रेम और श्र(ा उपजाती है। अगली पीढ़ी को स्वयं कष्ट सहकर भी सुख सौंपने की वह अमूल्य विरासत भी सौंपती है जो प्रतिदान और उआँण होने को असंभव करती है। जहाँ पिता का किया हुआ पिता को लौटाया नहीं जा सकता, बल्कि उसे अगली पीढ़ी को ही देकर न दे पाने की अतृप्ति एवं मनोग्रन्थि से मुक्ति पाई जा सकती है। अपनी 'यात्राा' कहानी के बारे में स्वयं ज्ञानरंजन नें कहा है कि ''यात्राा में वह व्यक्ति, जो मृत्यु को आमने-सामने खड़ा होकर देखता है, एक संपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में प्रकाशित हुआ है। मेरी यह कहानी उतना ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई, जितना होता तो अच्छा था।' इस वक्तव्य में 'संपूर्ण व्यक्तित्व' के स्थान पर 'संपूर्ण व्यवहार' शब्द का प्रयोग होता तो बात अधिक स्पष्ट हो सकती थी। हुआ यह है कि ज्ञानरंजन ने सृजनात्मक श्रम के साथ मृत्यु के बाद होने वाले हर तरह के मानव-व्यवहार को एक ही चरित्रा में डाल दिया है। इसका एक ही चरित्रा अनेक प्रकार की मानसिकता को जीता और उससे गुजरता है, जबकि वास्तविक दुनिया में अनेक और प्रायः अलग-अलग व्यक्ति इस कहानी में व्यक्त किसी एक मानसिकता से गुजरते हैं। जीवन में हम देखते हैं कि बहुत रागात्मक जुड़ाव एवं दुख पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी करा सकते हैं। मृतक के प्रति अतिशय लगाव की स्थिति में ऐसा हो सकता है। दूसरी स्थिति यह होती है कि मृतक के प्रति द्घृणा या लगाव का अभाव उसे मानसिक स्तर पर भीतर से दुखी होने से रोके। यदि दुख में या शोक में होने के अवसर पर कोई सामान्य या स्वस्थ बना रहता है तो समाज की पारंपरिक अपेक्षाएँ उससे शोक में बने रहने का अभिनय मांगती हैं। ऐसा भी हो सकता है कि मृत्यु से दुखी व्यक्ति वास्तव में दुख जीता हुआ भी धीरे-धीरे थकता हुआ निजी जीवन जीने की ओर लौट आए। ज्ञानरंजन ने इन तीनों प्रकार की मानवीय स्थितियों को एक ही कथानायक में 'मैं' के माध्यम से व्यक्त किया है। एक ही चरित्रा की तिहरी भूमिका इस कहानी को वैश्विक स्तर पर भी एक दुर्लभतम कहानी बनाती है तो कहानी में व्यक्त कई असंब( चरित्राों का मृत्यु-चिंतन एवं तिहरी भूमिका इस कहानी के मुख्य पात्रा के कई व्यवहार एवं संवादों को अपनी अतिशयता के कारण न समझ पाने वाले पाठक की दृष्टि में अविश्वसनीय या अस्वाभाविक बनाता है। पाठक या आलोचक संभवतः एक ही पात्रा के अलग-अलग मानव-व्यवहार और मानसिकता के रचनात्मक औचित्य को ठीक से समझ नहीं पाये होंगे। प्रगतिशील आलोचकों के द्वारा इस कहानी को अस्तित्ववादी कहानी मान लिए जाने का खतरा भी था। क्योंकि ज्ञानरंजन को प्रगतिशील कहानीकार के रूप में देखने की अपरिहार्यता भी थी, इसलिए न समझ पाने के कारण चुप रहना ही उन्हें बेहतर लगा होगा, जिस उपेक्षा की ओर ज्ञानरंजन इशारा करते हैं। इस तरह ज्ञानरंजन की 'यात्राा' कहानी मृत्यु जैसे महत्वपूर्ण जीवनानुभव पर स्वस्थ जीवन के लिए गंभीर विमर्श और प्रस्तावना प्रस्तुत करती है। कहानी में दिए गए कुछ सूत्राात्मक निष्कर्ष इस कहानी की उपलब्धि और महत्व के मूल्यांकन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन सूत्राात्मक निष्कर्षों में-'भले ही कुछ लोगों के लिए उनकी मृत्यु गंभीर बात हो लेकिन आने वाले भविष्य से इसका कोई संबंध नहीं बचा।' ;पृ. ९५द्ध 'कोई भी आनन्द के क्षणों में दुखद समाचार पसंद नहीं करता।' ;पृ. ९६द्ध तथा 'अस्तित्व की रक्षा की मानवीय क्रियाओं को कमीनगी समझना उचित नहीं है।' ;पृ. १०१द्ध आदि प्रमुख हैं। सै(ान्तिक और दार्शनिक प्रकृति की होते हुए भी ज्ञानरंजन की यह कहानी मृत्यु-प्रसंग को लेकर जीवन की सभी संभावनाओं की सृजनात्मक और वैचारिक यात्राा करती है। मानवीय शोक अंतर्मन से लेकर अभिनय तक अनेक रूप बदलता है। थका हुआ जीवन अन्ततः चुपके से अपने पास वापस लौट आता है-'थक जाना मैंने गौर किया है, हमेशा मुझे सच्चाई के निकट कर देता है।' ;पृ. ९५द्ध दुखी होना एक सामाजिक जरूरत के रूप में व्यक्ति पर कुछ प्रदर्शनात्मक व्यवहार करने की अपेक्षाएँ लादता है। यही अपेक्षाएँ ही जीवितों के लिए मृत्यु को विसंगति और विडंबना से पूर्ण बना देती हैं। मृत्यु-शोक का वर्णन करते हुए ज्ञानरंजन की यह कहानी दिलचस्प पारसी औरत, देशी गुलाब, मृतक की गर्भवती पत्नी कौमुदी, सभ्य देशों में शोक-प्रदर्शन के लिए विकसित रिवाज तथा आकाश में द्घुमड़ते बादलों की चर्चा से गुजरती हुई, जीवन की उन छोटी-छोटी वास्तविकताओं की ओर इशारा करती है, जो चाहे और या दूसरे दुःखों के विचलन के या व्यस्तता के रूप में ही क्यों न हो, जिन्दगी को सिपर्फ दुख में ही जीने की इजाजत नहीं देती-'यह खुदा की इनायत है कि चारों तरपफ की जिंदगी से कुछ न कुछ हमेशा निकल आता है। यह कुछ इतना साधारण मगर जबरदस्त होता है कि दबोचते हुए दुख को चुपचाप लतियाकर बाहर के बाहर कर देता है। संकट में मेरी सहायता दूसरी चीजें ही किया करती हैं।' ;पृ. १००द्ध समोसे, संतरे और सुन्दर स्त्रिायाँ मृत्यु-शोक में भी जीवन के नेपथ्य, आहटों और दस्तकों की सृष्टि करते हैं। यह कहानी अपने अंत में मृत्यु-चिंतन को छोड़कर जीवन जीने के पक्ष में वक्तव्य जारी करती है। मृत्यु-चिंतन और शोकाकुलता का मानवीय व्यवहार एक संवेदनशील सभ्यता के लिए आवश्यक है-'इसमें तारीपफ की बात नहीं हैं, लेकिन तुम छोटे से अज्ञात महात्मा हो। केवल भावुक होकर अवकाश, शहर और पत्नी के लिए तुम सैकड़ों मील से चले आ रहे हो।' ;पृ. १०२द्ध तथा 'यहाँ पहुँचकर मेरे रोने और खुश होने के बीच पफर्क समाप्त हो गया।' ;पृ. १०३द्ध ज्ञानरंजन की अनुभव कहानी शहर के यथार्थ और परिकल्पना के बीच उसके द्वारा अपने नागरिकों को दिए जा रहे जीवनानुभवों की पड़ताल करती है। कहानी के अंत में कहानी का नायक अपने जीवनानुभवों के लिए न सिपर्फ हीनता-ग्रन्थि और धिक्कार भावना का शिकार होता है, बल्कि एकांत में अपने ही गाल पर तमाचे जड़ता हुआ आत्मभर्त्सना के बहाने शहर भर्त्सना की सपफल लेखकीय अभिव्यक्ति करता है। इस दृष्टि से यह सकारात्मक और निष्कर्षात्मक अंत और हस्तक्षेप वाली कहानी है। ज्ञानरंजन की प्रायः सभी कहानियाँ सकारात्मक और सक्रिय अंत की प्रस्तावना करती हैं। साठोत्तरी पीढ़ी के मोहभंग काल के अन्य कथाकारों के बीच ज्ञानरंजन की यह निजी विशेषता है। वे सभ्यता-विमर्श के कहानीकार हैं। उनकी कहानियों का यथार्थ अब भी कालान्तरण करते हुए देखा जा सकता है। उनकी कहानियों में व्यक्त टिप्पणियाँ अब भी अद्यतन हैं। कलात्मक तकनीकों की दृष्टि से 'अनुभव' ज्ञानरंजन की समृ( कहानियों में से एक है। यह कहानी आधुनिक नागरिक जीवन के दर्शन को निम्न शब्दों में प्रस्तुत करती है-'एक बार तो अनुभव हर चीज का होना चाहिए, यह आज की जिंदगी का ब्रह्म सूत्रा है।' ;प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. ६७द्ध 'आदमी सबसे भिन्न है। इसको कभी मत भूलो। उसका लोक आश्चर्यों से भरा है। मन को अनुभवों के विराट में दौड़ने दो, भटकने दो।' ;प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ. ६७द्ध मोइत्राा द्वारा किसी को जीप से कुचलकर हत्या करने का प्रसंग स्पष्ट रूप से पफैण्टेसी शिल्प के इस्तेमाल का उदाहरण है-'मैंने कहा, कुत्ते, तुम क्या मर्डर करोगे।' ...गाड़ी स्टार्ट करते हुए उसने कहा, 'तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है, शु( द्घी ;वह मुझे हमेशा शु( द्घी कहता था।द्ध इधर आओ। उसने इसके बाद लंबा हाथ बढ़ाकर जीप के पिछले हिस्से से एक कुचला हुआ मूंड़ उठाया और वापस गिरा दिया।' ;वहीं, पृ. ६२द्ध यह कहानी शहर के अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए दृश्यों एवं दृष्टान्तों के अनेक चित्रा प्रस्तुत करती है। अनुभव कहानी का कथानायक 'मैं', मित्रा गणेश के बहाने शहरी जीवन में अपनी मानसिक चर्या के अनुभवों एवं उन अनुभवों से निष्पादित सूत्राों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करता चलता है। अलग-अलग पदबंधों में लिखी कविता की तरह यह कहानी अलग प्रसंगों, अलग दृष्टान्तों-दृष्टिपातों के माध्यम से जीवन और सभ्यता का विमर्श उपस्थित करती जाती है-'मैं समझता था कि यह मनुष्य का विस्तार है कि वह जहाँ पैदा हो, वहीं न मर जाए।' ;पृ. ५८द्ध 'मैंने सोचा, अगर मैं दर्शक हूँ तो मुझे जल में कमल-जैसा होना है। ...जुड़ोगे तो भोगोगे। लोगों को पहचानने में व्यर्थ वक्त जाया न करो। केवल अपना काम करो। ;पृ. ६३द्ध 'आलोचकों को भाड़ में जाने दो। उनकी खोपड़ी लजीज आलोचनाओं से लबालब भरी है। वे उसी में डूबे-उतराएँ, व्यस्त रहे। अजीब जाति है इनकी। ये समय को चाल रहे हैं, लोगों को चाल रहे हैं, इतिहास को चाल रहे हैं, विद्वान हैं, चलनी बन गए हैं।' ;पृ. ६३द्ध 'यह मार थी और इस मार को खाकर मैंने कहा, अब जैसा भी द्घटे लेकिन बागडोर का प्रयोग खत्म।'' ;पृ. ६४द्ध 'यह शु( दलदल है। अपने को बरबाद मत करो।' ;पृ. ६५द्ध इस कहानी में ज्ञानरंजन की रचना-प्रक्रिया की मुख्य विशेषता कथा-भाषा को काव्य-भाषा में रूपान्तरित और उससे विस्थापित करने की है-'शान्ति की चपेट बढ़ती जा रही थी। मैं अन्दर से बहुत शान्त था। मैं अपनी अशान्ति को किसी दार्शनिक भाले से ही भेदना चाहता था। शान्ति किसी दुरभिसंधि के एक माकूल इस्तेमाल की तरह बहुत आराम के साथ चल रही थी।' ;पृ. ५६द्ध 'शहर अपनी कब्र में विदा ले रहा है? बगीचे, सड़कें और इमारतें अब एक भूत की तरह हिल रही हैं।' ;पृ. ६४द्ध तथा 'क्या तुम्हें उनमें परिपक्वता की सड़ांध नहीं आ रही है। वे अपना हाथ उठा चुके हैं और अब दिन भर में सिपर्फ कई हजार धड़धड़ाती सांसें लेते हैं।' ;पृ. ६५द्ध पाठकीय सार्थकता के लिए यह कहानी क्षेपक की शैली में एक अप्रत्याशित जीवन-अनुभव प्रस्तुत करती चलती है। अंधेरे में अपनी गिरी चवन्नी खोजते एक अनजान व्यक्ति की अपनी माचिस जलाकर सहायता करना और चवन्नी पाकर उसका अपनी झेंप मिटाने के लिए तुरन्त खिसक जाना। इस परिस्थिति को ज्ञानरंजन ने असामान्य तर्क की अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया है। व्यवहार के कारण के रूप में वह एक भिन्न परिकल्पना देता है-'चवन्नी लेकर जब वह खड़ा हुआ तब उसे लगा कि सन्नाटा और अकेलापन है और उसकी चवन्नी खतरे से बाहर नहीं है। कृतज्ञता और भय के बीच पफंसा वह तेजी से खिसक गया।' ;पृ. ५७, ज्ञानरंजन, प्रतिनिधि कहानियाँद्ध आर्थिक विपन्नता में पड़े मनुष्य के लिए चवन्नी का महत्व और उसको खोजते हुए किसी मनुष्य द्वारा पकड़ लिए जाने के कारण खिसक लेना एक प्रत्याशित सामाजिक अनुभव है लेकिन कहानीकार और कथानायक 'मैं' उसका कारण दूसरा ही प्रस्तुत करते हैं, जिसकी असहजता को पाठक महसूस कर सकता है और उसके अन्तराल में सोचने के लिए विवश भी हो सकता है। इस तरह यह कहानी सोचने के लिए भी पाठकों को उकसाती चलती है। प्रेम-भावना की सामाजिकता की पड़ताल की दृष्टि से ज्ञानरंजन की 'हास्यरस' कहानी महत्वपूर्ण है। यह कहानी कचहरी में प्रेम-विवाह करके अभी-अभी बाहर निकले एक नवविवाहित दम्पति के प्रेम व्यापार और मानसिकता का चित्राण पुरुष-मन और चिन्तन के माध्यम से करती है। यह कहानी आज प्रकाशित होती तो संभवतः स्त्राी-विमर्शवादी महिला-कथाकार शोर मचा देतीं, लेकिन इसमें कुछ ऐसा सामान्यीकरण है कि पुरुष के स्थान पर स्त्राी पात्रा रख दिया जाए तो भी उसकी मनोवैज्ञानिकता सुरक्षित रहेगी। हास्यरस कहानी का आरंभ कथा-नायक की इस स्वीकारोक्ति के साथ होता है कि 'बाहर निकलते ही मैंने अपने को दूसरा और पराजित अनुभव किया मेरी पत्नी संतुष्ट और निश्चिंत है और उसके खिले हुए चेहरे से मुझे प्रसन्नता नहीं हो रही है। यह खिला हुआ चेहरा और कुछ नहीं, विजय का गर्व है। यह स्पष्ट हो चुका है कि मैं द्घाटा खा चुका हूँ और मुझे पराजित करने वाला मेरा साथी तत्काल हर चीज की मांग करने का अधिकारी हो गया है।' ;पृ. २९द्ध इस कहानी में ज्ञानरंजन ने प्रेम विवाह के प्रेमेतर कारणों का भी सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जो प्रेम विवाहों को प्रायः द्घटित करते हैं। चयनित साथी के व्यक्तित्व की पसंद-नापसंद, प्रेम के पूर्व-दृष्टान्तों का प्रभाव कुछ अधिक उत्तेजक और जोखिमपूर्ण ढंग से क्रान्तिकारी ;अंतर्जातीयद्ध विवाह करने की लालसा, जो ऐसे विवाहों के कर्ताओं को विशु( प्रेम से इतर भी नायकत्व और वैशिष्ट्‌य प्रदान करते हैं। यदि प्रेम वास्तव में प्रेमियों के परस्पर व्यक्तित्व के गहरे प्रभाव से उत्पन्न नहीं है तो विवाह के पश्चात जोखिम की उत्तेजना समाप्त होते ही मोहभंग का शिकार होकर प्रेम, गले पड़े प्रेमी की हत्या तक भी जाते देखा गया है। मोहभंग की इन्हीं वैचाारिक संभावनाओं की तलाश करने वाली यह कहानी प्रेम विवाह पर एक बहुआयामी विमर्श प्रस्तुत करती है। ज्ञानरंजन की अन्य कहानियों की तरह इस कहानी में भी प्रेम और विवाह जैसी सामाजिक और सांस्कृतिक आदत पर अनेक रोचक और मौलिक टिप्पणियाँ की गई हैं। जैसे-'वह बड़ी उत्सुकता, ताजगी और सिपफारिश के साथ गवाही देने आया था। असलियत यह थी कि वह अनुभव प्राप्त करना चाहता था।' ;पृ. ३१द्ध 'ऐसी स्त्रिायों के चरित्रा का क्या भरोसा किया जाए? कब किसी दूसरे पर पिफसल पड़ें। ;पृ. ३२द्ध 'मुझे भी दुनिया को पटाना चाहिए।' ;पृ. ३६द्ध 'इस समय मुझे सिलसिलेवार वे सभी परिचित और गृहस्थ दोस्त याद आ रहे हैं, जो पिकनिक, भोजन और द्घरेलू समारोहों में मुझ अकेले अविवाहित को निमंत्रिात करके दया दिखाते और अपनी उदारता का परिचय देते हैं। मैं ऐसे सब लोगों के द्घर जाऊँगा और अपनी स्त्राी दिखाऊँगा।' ;पृ.३७द्ध तथा 'कुंवारे लोग दूसरे की बीवी देखकर लालची और ईर्ष्यालु भी सकते हैं।' ;पृ. ३८द्ध 'पफेंस के इधर और उधर' कहानी वस्तुतः शहरी नागरिक जीवन की सामाजिकता का अपने पड़ोसी से उसकी संबंधहीनता और संवेदनहीनता का रोचक वृत्तांत प्रस्तुत करती है। मनुष्य स्वभावतः ही एक सामाजिक प्राणी है और उसके लिए निरपेक्ष-तटस्थ जीवन जीना प्रायः संभव ही नहीं। कहानी में पफेंस के उधर रहने वाले पड़ोसी में दूरवर्ती सामाजिकता मिलती तो है, लेकिन वह आधुनिक समय के विस्थापन की मानव-नियति से संस्कारित और संयमित रूप में है, जबकि इस पार की सामाजिकता अपनी जड़ों को जीने वाली स्थानीय सामाजिकता है। कहानीकार ने इस कहानी में आधुनिकताजीवी और परंपराजीवी पड़ोसियों की भिन्न मनोरचना और वैचारिकी का द्वंद्व भी सम्मिलित कर दिया है। कहानीकार ने दोनों ही पड़ोसियों को एक समकालीन और समकक्ष सामाजिक वास्तविकता की तरह उपस्थित कर बिना किसी अतिरिक्त टिप्पणी के उसे पाठकों के सामने रख दिया है। ज्ञानरंजन की बहुआयामी और बहुपक्षीय जीवन-दृष्टि उनकी अन्य कहानियों की तरह इस कहानी को भी सर्वकालिक और विशिष्ट बनाती है । ज्ञानरंजन की 'छलांग' वयःसंधि में अन्तर्मन की सच्चाइयों और सार्वजनिक अभिनय के बीच द्वंद्व को रेखांकित करने वाली एक अच्छी कहानी है। यौन भावनाओं को लेकर चेतन व्यवहार और अचेतन मन की कशमकश को चित्रिात करती यह कहानी ज्ञानरंजन की अन्य कहानियों की तरह ही मानव-मन के भीतरी रहस्यों को उजागर करती है। इसे किसी व्यक्ति द्वारा दिखाए जा रहे चरित्रा और जिए जा रहे चरित्रा के पफर्क के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है। बाहर से सब कुछ शांत और सभ्य दिखने के बावजूद जिंदगी को अशांत और यातनादायी रिश्तों में बदल देती है। उनकी 'अमरूद का पेड़' कहानी पुरानी पीढ़ी द्वारा यथार्थ के सही साक्षात्कार न कर पाने की समस्या से संबंधित है। मनोवैज्ञानिक शब्दावली में इसे अंधविश्वासपूर्ण प्रत्यक्षीकरण की समस्या के रूप में भी देखा जा सकता है। कहानी में कन्हैयालाल की बूढ़ी पत्नी के इस कथन के साथ कि 'पश्चिम की तरपफ यदि मकान का मुखड़ा हो और सामने ही अमरूद का पेड़ तो राम-राम बड़ा अशुभ होता है।' संस्मरण के शिल्प में लिखी गयी इस कहानी में अमरूद का पेड़ अपनी अविस्मरणीय पफलदार उपस्थिति के बावजूद दुर्भाग्यपूर्ण जीवन की तमाम आशंकाओं और अभिशाप का प्रतीक भी बन जाता है। नयी पीढ़ी के आशावादी और अंधविश्वास रहित जीवन-बोध की सराहना करने वाली यह कहानी इस स्वस्थ दृष्टि की प्रस्तावना करती है कि 'हममें दृष्टिकोण की उदारता परिलक्षित होती और किसी भी द्घटना या आकस्मिकता या एक सम्पूर्ण परिस्थिति को हमलोग अनहोनी नहीं मानते थे। जीवन में सब सहज है, सब संभव।' ;पृ. ११द्ध इस कहानी की माँ अपने संपूर्ण प्रतिरोध के बावजूद जीवन की नकारात्मकताओं को अपशगुनी अमरूद के पेड़ से जोड़ने के लिए विवश होती है। 'द्घण्टा' ज्ञानरंजन की उन बहुचर्चित कहानियों में से एक है, जिनके निहिताथों का पफलक बड़ा है। ज्ञानरंजन की अन्य कहानियों की तरह इस कहानी में भी सभ्यता-समीक्षा का गंभीर विमर्श उभरता है। वैसे तो उनकी हर कहानी सभ्यता-समीक्षा के अलग-अलग विशेष आयाम अपने वैचारिक एवं काव्यात्मक गद्य के माध्यम से उठाती है। 'द्घण्टा' कहानी में असुविधाजीवी निम्न मध्यवर्ग की पृष्ठभूमि से आए बु(जिीवी के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्था में तथाकथित उच्च-अभिजातवर्गीय उपनिवेश की समीक्षा की गई है। कलात्मक दृष्टि से भी 'द्घण्टा' कहानी का शिल्प महत्वपूर्ण है। इसका कथानक कहानी के मुख्य पात्रा के चिन्तन से ही नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार और सक्रियता से भी उभारा गया है। प्रथम दृष्ट्‌या पेट्रोला मध्यवर्गीय असुविधाजीवियों का आशियाना लगती है । कुन्दन सरकार का द्घण्टा होना आर्थिक अपंगता या परावलंबिता का ही प्रतीक है। कहानी की सारी सृजनात्मक संभावनाएँ रेस्त्राां को पूंजीवादी-बाजारवादी सभ्यता के रूपक के रूप में प्रस्तुत करने में ही छिपी हुई हैं। रेस्त्राां के डॉयस पर नृत्य करती युवती के अधोवस्त्रा का नाड़ा खुलकर लटकने पर, उसके चमकदार परिधान के पीछे से उसके मलिन अन्तःवस्त्राों का झांकना उसके निम्नवर्गीय होने की ही प्रतीकात्मक द्घोषणा है। द्घण्टा की अनुगूंज संपूर्ण निम्न-मध्यवर्ग के प्रतिनिधि के रूप में भी सुनी जा सकती है । इस तरह कहानी में रेस्त्राां का संपूर्ण परिवेश मनोवैज्ञानिक सांकेतिकता लिए हुए और सोद्देश्य है । उसका उत्सवधर्मी, नाटकीय, कृत्रिाम, प्रायोजित जीवन बाजार केन्द्रित शहरी सभ्यता का प्रतिनिधि प्रतिरूप ही है। इस कहानी में भी सूत्राात्मक निष्कर्ष एवं काव्यात्मक अभिव्यक्ति वाले अनेक अद्वितीय रोचक स्थल हैं-'वह ;पेट्रोलाद्ध कापफी अज्ञात जगह थी। उसे केवल पुलिस अच्छी तरह जानती थी।' ;पृ. १०४द्ध, 'चीजों को चखते हुए वे दूसरों की औरतों का शील सभ्यतापूर्वक चाट रहे थे। वे अपने अलावा दूसरों को वहाँ अनुपस्थित समझ रहे थे। कहीं वे इस दुर्गन्ध के भी शिकार थे कि रेस्त्राां का यह हॉल उनके लिए वातावरण बनाता है और यह दुनिया उनकी शोभा के लिए बनी है।' ;पृ. १०९द्ध, 'उनकी आँखों में बेडरूम सीन चमक रहा था। 'बहिर्गमन' कहानी आधुनिक मीडिया-युग के नायकों के जीवन, यथार्थ और प्रसि(ि की प(ति पर केन्द्रित सर्वाधिक प्रभावी, प्रामाणिक और विशेषज्ञ कहानी है। यह कहानी एक मामूली आदमी की आँख से समय के ख्यातिलब्ध बड़े विशिष्ट आदमी मनोहर और सोमदत्त के संवेदनातीत बड़प्पन की शवपरीक्षा है। अपने आम ;निम्नमध्यवर्गीयद्ध परिवेश से असंतुष्ट अतिसंवेदनशील कस्बाई युवक मनोहर अपनी महत्वाकांक्षी ऊंची उड़ान के साथ ही किसी राकेट की तरह ही अपनी संवेदनशीलता का ईंधन खोता जाता है। आम समाज की जड़ता से क्षुब्ध, उसके यथार्थ को द्घृणा और नापसंदगी के ज्वलनशील ईंधन से पीछे छोड़ता हुआ ग्रामीण कस्बे से दिल्ली पहुँचता है पिफर दिल्ली से भी दूसरे बूस्टर इंजन प्रवासी सोमदत्त का प्रयोग कर विदेश यात्राा पर रवाना हो जाता है। यह कहानी मूलतः अवसरवादी उपलब्धियों एवं विशिष्टताबोध को खारिज करती है। कहानी के प्रारंभ में ही कथावाचक 'मैं' ने अपनी पृष्ठभूमि स्पष्ट कर दी है-'मैं विद्रोही नहीं था। मेरा मार्ग नितान्त सड़ियल, भाग्यशून्य और आम था। मैंने अपने मामूली जीवन को केवल चौकन्नी पहरेदारी के अन्दर जिलाए रखने की ही तमन्ना की थी।' ;पृ. ११७द्ध इस तरह इस कहानी का कथावाचक मैं एक आम आदमी की दृष्टि से असमान्यता के आकांक्षी कथानायक मनोहर के रूप में आज के आम सपफल बु(जिीवी की महत्वाकांक्षी उड़ान का कथांकन करती है। ज्ञानरंजन की प्रगीतात्मक आत्माभिव्यक्ति वाली आरंभ की छोटी कहानियों से अलग 'बहिर्गमन' कथावस्तु और शिल्प दोनों ही स्तरों पर महाकाव्यात्मक संपूर्णता और विस्तार वाली अद्वितीय कहानी है। पहली दृष्टि में इसके कथानक को प्रतिभा-पलायन, करियर-निर्माण की महत्वाकांक्षी यात्राा, विदेशगमन की अभिलाषा आदि से भी जोड़कर देखा जा सकता है, लेकिन आगे चलकर यह कहानी यौन-सुख की कामना वाली आधुनिकता से असहमति का आख्यान बन जाती है। इस दृष्टि से सोमदत्त के जीवन का वह प्रसंग कापफी संकेतपूर्ण है, जब अनिच्छुक रहने की स्थिति में देर रात में पत्नी के पास पहुँचे सोमदत्त को उसकी पत्नी ही एक अन्य स्त्राी के पास यौन-सुख के लिए भेज देती है। ऐसी पत्नी इस उदारता और स्वतंत्राता का इस्तेमाल अपने पक्ष में भी कर सकती है, इस संभावना को कहानीकार ने पाठक की कल्पना के लिए छोड़ दिया है। वस्तुतः बहिर्गमन कहानी की अविस्मरणीयता एक संवेदनशील विद्रोही क्रांतिधर्मी कस्बाई युवक के कुण्ठा, संद्घर्ष और निष्क्रमण की जीवन-यात्राा में उसकी संवेदनात्मक मृत्यु या उसके संवेदनातीत होते जाने के व्यक्तित्वांतरण और विस्थापन के त्राासद आख्यान होने में छिपी हुई है। आधुनिक सभ्यता में पूंजी और बाजार पर आधारित प्रसि(ि के खोखलेपन, उसकी कला, पेशेवर मनोविज्ञान और मिथ्या छवि-निर्माण की प्रक्रिया पर भी यह कहानी अच्छा प्रकाश डालती है।
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